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शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

ग़ज़ब का हुस्न मेरे दिलदार का है !
क्या बताऊँ, कितना लुत्फ़ दीदार का है !!
छिपी हुई है जिस में इकरार की बातें,
कुछ यूँ अंदाज़ उसके इनकार का है !
क़त्ल कर देती हैं उसकी तिरछी नज़रें,
तुम ही कहो! क्या काम तलवार का है !
जब से देखी वो उरियाँ बाहें, ढलता आँचल,
क़रीबे मर्ग अब हाल बीमार का है !
"कमल" मज़ा है तो सिर्फ उसकी उल्फत में,
बाकी जहाँ का मज़ा सब बेकार का है !

(हुस्न=सौंदर्य, लुत्फ़=आनन्द, दीदार=दर्शन, इकरार=स्वीकृति, अंदाज़=ढंग, इनकार=मनाही, उरियाँ बाहें=नंगे हाथ, क़रीबे मर्ग=मृत्यु के समीप, जहाँ=संसार )

शनिवार, 14 सितंबर 2013

जुल्फें शानों पे फिर हिलाती हुई!
मेरे पहलू में आ, खिलखिलाती हुई!!
संगेमरमर सी तेरी उजली कमर,
जैसे शमा कोई, झिलमिलाती हुई!
वस्ल की छाँव अब तो दे दे ज़रा,
धूप  फुरकत की है, चिलचिलाती हुई!
देखो मौसम हसीं, उमंगें जवाँ ,
गुज़रे खाली ना शब्, तिलमिलाती हुई!
लेके आगोश में खो जायें "कमल"
दुनिया रह जाये ये, बिलबिलाती हुई!
(शानों पे=कन्धों पर, वस्ल=मिलन, फुरकत=विरह, शब्=रात्रि, आगोश=गोद )

सोमवार, 12 अगस्त 2013


दुनिया के हसीं देखे, तुझसा शबाब नहीं है!
तू लाजवाब दिलबर, तेरा जवाब नहीं है!!
लाया कोई फ़रिश्ता जन्नत से तुझको याँ पर,
बाग़-ए -जहान में तो, ऐसा गुलाब नहीं है!
आँखों के आगे तेरी, मय की बिसात क्या,
इतना नशीला कोई, जाम-ए -शराब नहीं है!
पर्दों में छुपे जलवे कर देते हैं दीवाना,
मर जाये जान से गर कोई हिजाब नहीं है!
है शुक्र उस खुदा का, जो मिले "कमल" को तुम हो,
तेरा कुर्ब करना हासिल, किसका ख्वाब नहीं है?
(शबाब=यौवन, फ़रिश्ता=देव दूत, जन्नत=स्वर्ग, याँ=यहाँ, बाग़-ए -जहान=सँसार रुपी उपवन , मय=मदिरा, बिसात=सामर्थ्य, जाम-ए -शराब=मदिरा का प्याला, हिजाब=आवरण, कुर्ब=सामीप्य, हासिल=प्राप्त )

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

मेरे प्यारे दोस्तों ! आप सभी को "कमल शर्मा" की जानिब से  ईद बहुत बहुत मुबारक हो ! वो परवरदिगार आपके दिल की झोली को तमाम खुशियों से भर दे !

मुबारक हो , मुबारक हो, हम सबको ईद मुबारक हो !
जिस रब ने इतनी खुशियाँ दी उस रब को ईद मुबारक हो!!
इस जानिब भी, उस जानिब भी, खुशियों में डूबी सिम्त सभी,
पच्छिम को ईद मुबारक हो, पूरब को ईद मुबारक हो!
है ईद का मतलब दोस्त ख़ुशी, और खुशियों पर है सभी का हक,
हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई , सिख मजहब को ईद मुबारक हो!
चेहरे की ज़रा खुशियाँ देखो जिस जिस को भी ईदी मिली,
आँखों को ईद मुबारक हो , और लब को ईद मुबारक हो!
है चाँद तेरा एहसान "कमल" जो दीख गया कल शब् को तू,
इस दिन को ईद मुबारक हो, उस शब् को ईद मुबारक हो !
(जानिब=ओर , सिम्त=दिशा, मजहब=धर्म, लब =होंट, शब्=रात) 

बुधवार, 7 अगस्त 2013

आ रहा हूँ कल मैं मिलने तुझसे तेरे गाँव में. . .

शहर की इन गलियों में घुट रहा है मेरा दम,
आग लेकिन पेट की दूर ले आई सनम,
पड़ गयी मजबूरियों की बेडी मेरे पाँव में,
आ रहा हूँ कल मैं मिलने तुझसे तेरे गाँव में. . .

इक तरफ दुनिया खड़ी इक तरफ मेरा प्यार है,
फैसला किस्मत पे है जीत है या हार है,
देखते हैं कौन जीते इश्क के  इस दाँव में,
आ रहा हूँ कल मैं मिलने तुझसे तेरे गाँव में. . .

सुबह होते चल पडूँगा छोड़ कर ये राग रंग,
मुझको कुछ नहीं चाहिए सिर्फ तू और तेरा संग,
तुम वहीँ इन्तिज़ार करना गुलमोहर की छाँव में,
आ रहा हूँ कल मैं मिलने तुझसे तेरे गाँव में. . .

शनिवार, 27 जुलाई 2013

मेरे प्रिय मित्रों !आप सभी मेरी रचनायें बड़े प्रेमपूर्वक पढ़ते  है  और अपने अमूल्य विचार भी व्यक्त करते हैं! इसके लिये मैं आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ और आपको कोटि कोटि धन्यवाद देता हूँ ! अब आप सब मेरी रचनायें/कविताये/ग़ज़लें हिंदी जगत की सुप्रसिद्ध प्रकाशन संस्था "हिंद-युग्म" से प्रकाशित "पगडंडियाँ" पुस्तक में भी पढ़ सकते हैं ! हाँ, पुस्तक पढ़कर अपने बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराईयेगा ! आपका अपना-------कमल शर्मा !
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जलवा नुमाई क्या हुई उसके शबाब की!
उम्मीदें और बढ़ गयी दिल-ए-बेताब की!!
उसकी आँखों का नशा अभी बाकी है,
हटाओ सामने से ये सुराही शराब की!
मैं अपनी ही दुनिया में खुश हूँ वाइज़,
हो तुझी को मुबारक दुनिया किताब की!
जो दिल में आया मेरे करूँगा वही मैं,
फुरसत नहीं जो सोचूँ गुनाहोसवाब की!
बस अब तो अपनी कलम रोकिये "कमल",
बेपर्दा हो ना जाये बातें हिजाब की!
(वाइज़=उपदेशक, किताब=धर्मशास्त्र, गुनाहोसवाब=पाप और पुण्य, हिजाब=पर्दा )
किस्मत ने देखो क्या खेल खेला !
तुम भी अकेले, मैं भी अकेला !!
जब से गए तुम, तब से ये दिल,
उजड़ा सा बाग़, बिखरा सा मेला !
जहाँ के सभी आशिकों को बुलाओ,
है कौन ऐसा? ना जिसने गम झेला !
शबोरोज़ वो ही फुरकत के गम,
नन्हीं सी जाँ और इतना झमेला !
"कमल" को ना आया करना मोहब्बत,
भले ही कहे लोग मजनूँ का चेला !
(शबोरोज़=रात-दिन, फुरकत=विरह)

शनिवार, 20 जुलाई 2013

और इजाफा हो गया है ख्वाहिश में!
सनम का साथ जो मिला बारिश में!!
मैं तो कह ही दूँगा आज हसरतें अपनी,
तुम भी कमी ना रखना फरमाईश में!
तकल्लुफ बरतरफ, कर लेंगे अब दिल की,
वक़्त क्यूँ खोना शुक्रिया नवाजिश में!
हम आगोश हुए, दिल को ही क्यूँ कहना,
आँखें भी शामिल थी इस हसीं साजिश में!
"कमल" के साथ जो भीगते देखा उसको,
रकीब भी आ गया लो गर्दिश में!
(इजाफा=वृद्धि, हसरतें=इच्छायें, तकल्लुफ बरतरफ=औपचारिकता छोडो, नवाजिश=धन्यवाद, हम आगोश=आलिंगन बद्ध, साजिश=षड़यंत्र, रकीब=प्रेमिका का दूसरा प्रेमी, गर्दिश=चक्कर )

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

बाँटो धरम के नाम पे ये किसकी सलाह है ?
जायेगी कहाँ किश्ती जब ऐसे मल्लाह है?
मालिक तो कुल जहान का एक ही तो है,
माला में राम है तो तस्बीह में अल्लाह है!
उस रब को याद रख हर अमल से पहले,
कहना श्री गणेश और पढना बिस्मिल्लाह है!
जो कुछ भी करो तुम हो काबिल-ए -तारीफ,
लगता है दिल को अच्छा कहता कोई वल्लाह है!
वालिद का साया भी अब सर से उठा अपने ,
लिखता है "कमल" खुद ही करता इस्लाह है!
(किश्ती=नाव, तस्बीह=माला, अमल=कर्म, वालिद=पिता, इस्लाह=संशोधन )

रविवार, 14 जुलाई 2013

हसरतें गुलों की ले, गुलज़ार में गया !
मगर पूरा दिन बीनते खार में गया !!
बिना खरीदे ही चला आया घर को,
फिर क्यूँ भला मैं बाज़ार में गया !
उतार दिया लोगों ने निगाहों से,
कल ज़रा जो मैं कूए यार में गया !
नींद, आराम, चैन, सुकूँ  सारा,
लुटा सब कुछ मैंने प्यार में दिया !
कर दिया वापस दिल को लेके "कमल ",
नक़द का माल भी उधार में  गया !

सोमवार, 20 मई 2013

ना बिलकुल होंट सिये मैंने !
भर भर कर जाम पिये मैंने !!
दोनों हाथों से पिलाते गये,
ये कौनसे सवाब किये मैंने !
बातों में वक़्त ना पता चला,
पल भर में साल जिये मैंने!
ना मुफ्त मिली ये मये इश्क,
हाँ, सिक्के वफ़ा के दिये मैंने!
हर शेर "कमल" खुद ही का है,
क्यूँ कहूँ औरों से लिये मैंने!

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

बिगड़ता जा रहा अपना हाल दिन-ब -दिन!
सिकुड़ती जाती चेहरे की खाल दिन-ब -दिन!!
कोई कोशिश करे लाखों मौत से बच नहीं सकता,
बढ़ता आ रहा उसका जाल दिन-ब -दिन!
जवानी में भरे थे और रंगत भी गुलाबी थी,
पिचकते जाते आके अब गाल दिन-ब -दिन!
गये वो दिन तेरी रफ़्तार जब दुनिया को भाती थी,
होती जाती है ढीली चाल दिन-ब -दिन!
"कमल" एक दिन वो होगा जा मिलेगी जब ज़मीं से ये,
झुकती जाती कमर की डाल दिन-ब -दिन!

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

"कमल" तो सिर्फ शायरी का तालिब है!
उस्ताद तो आज भी मीर-औ-ग़ालिब है!
कौन  पढ़ सका तहरीर-ए-तकदीर,
लिखने वाला बड़ा तेज़ कातिब है!
मौका परस्ती तो देखो इस दिल की ,
कल था मेरी, आज तेरी जानिब है!
रख या फेंक, ये दिल तुझको दिया,
कर वही जो तुझे मुनासिब है!
रश्क करता है माह तेरे रुख से,
जहाँ मैं मुझसे भी बढ़के साकिब है!
(तालिब=इच्छुक, उस्ताद=गुरु, मीर-औ-ग़ालिब=मीर और ग़ालिब: दो प्रसिद्द शायर, तहरीर-ए-तकदीर=भाग्य के लेख, कातिब=लिखने वाला, जानिब=ओर, मुनासिब=उचित, रश्क=ईर्ष्या, माह=चन्द्रमा, रुख=मुख मंडल, साकिब=उज्जवल)

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

रहमदिल है यार मेरा , आजकल मेरे लिये !
आ गया है अच्छा वक़्त, दरअसल मेरे लिये !!
मैं तो सुनता था ज़माना, खार खाता इश्क से,
दोस्तों! देखो जहाँ , गया बदल मेरे लिए!
सोचता हूँ तेरी खातिर, मैं भी कुछ करता चलूँ,
तूने तो सब कुछ किया, जान-ए-ग़ज़ल मेरे लिये !
यार की खिदमत में हूँ, मरने की फुरसत नहीं,
और कोई दिन कर मुकर्रर, अय अजल मेरे लिये !
दिल तो फूला ना समाया रात में  जब ये सुना,
मैं "कमल" के वास्ते हूँ और "कमल" मेरे लिये !
(रहमदिल=दयालु, दरअसल=वास्तव में, खार खाना =शत्रुता रखना, खिदमत= सेवा, मुकर्रर= निश्चित, अजल=मृत्यु )

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

हम कहाँ वक़्त जाया करते हैं !
यूँ ही दिन बीत जाया करते हैं!!
मानता हूँ , खाने की चीज़ नहीं,
लोग फिर भी गम खाया करते हैं!
नींद सच्ची वही ख्वाब सच्चा,
आप जब तशरीफ़ लाया करते हैं!
ना आयी रास दुनिया को उल्फत,
जहाँ वाले ज़ुल्म ढाया करते है!
बताते गैर को, "कमल" घर पे है,
क्या एहसाँ हमसाया करते हैं!
(जाया करना=नष्ट करना,हमसाया=पडोसी)



रविवार, 31 मार्च 2013

दुनियावी बातों से हटके ज़रा हूँ मैं!
प्यार और उल्फत से हाँ भरा हूँ मैं!!
नीयत खराब नहीं, खोटी भी नहीं,
इस मामले में थोडा खरा हूँ मैं!
सच कड़वा भी है मंज़ूर मुझे,
झूठी तारीफों से हमेशा डरा हूँ मैं !
उभर जाते हैं कई शेर ज़ेहन में मेरे,
उसकी अदाओं पे जब भी मरा हूँ मैं!
आ गया फिर तेरी महफ़िल में "कमल",
कहूँगा शेर सभी गज़लसरा हूँ मैं!
(ज़ेहन=मस्तिष्क , गज़लसरा=ग़ज़ल सुनाने वाला)
 

मंगलवार, 26 मार्च 2013

भुला करके सारे शिकवे गिलों को!
मोहब्बत के रंग से रंग लो दिलों को!!
सैलाब-ए-उल्फत कुछ इस तरह उमड़े,
डूबा डाले नफरत के साहिलों को!
लगा करके रंग आज मोहब्बत बढाओ,
मोहब्बत से आसाँ करो मुश्किलों को!
होली किसी की भी ना तन्हा गुज़रे,
माशूका आशिक पायें  मंजिलों को!
हँसो  खेलो यारों दुनिया है फानी,
"कमल" कर दो रंगीं अब महफिलों को!

चेहरे का रंग मस्त था, जैसे हो गुलज़ार!
रंग वगैरह खरीदने, गया मैं कल बाज़ार!!
गया मैं कल बाज़ार, सोचा रंग सारे ले लूँ !
उड़ा उड़ा कर रंग, पूरे दिन भर खेलूँ !!
"कमल" ने पूछा भाव, रंग लाल पीले हरे का!
सुनकर भैया दाम, उड़ गया रंग चेहरे का !!

रविवार, 24 मार्च 2013

होरी खेले मोहन, राधा रानी के संग !

जमुना जी के किनारे, खिला रास-रंग!
राधे श्याम कहे , जमुना-जल की तरंग!!
ग्वालन छम छम नाचे, लेके मन में उमंग!
आज ग्वाले मटकते हैं, पी पी के भंग!!
राधा जी की दशा देख, सब ही है दंग !
कान्हा जी ने भिगो डाला, एक एक अंग !!
वर्णन कैसे करूँ , मेरी वाणी हैं तंग!
"कमल शर्मा" बजाले तू ढोलक मृदंग!!

शनिवार, 23 मार्च 2013


"छेड़ दी लड़की कोई" जैसे ही लोगों ने सुना!
चप्पलों से, थप्पड़ों से, मनचला खूब धुना!!
पिटके, अब तो मनचला भी सोचता होगा,
क्यूँ ये लड़की चुनी?क्यूँ ये मोहल्ला चुना?
आया था लेकर, सिर्फ एक दर्द, दिल में,
चला वो लेके दर्द बदन  में चार गुना!
जाके घर मनचले, सभी  चोटों पर,
सिकाई करना लेके पानी कुनकुना!
मनचलों ! याद रहे "कमल" की सीख,
कीडा खुद फँसता, जब भी रेशम को बुना!

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

*****विश्व जल दिवस पर *****
पानी की कीमत ज़रा, सोच अरे नादान!
मिले ना गर जो वक़्त पर, सूख जाती है जान !!
सूख जाती है जान, फिर भी ना डरते!
बिना ज़रुरत के भी, पानी बरबाद हैं करते!!
सही सोचता "कमल", रही गर यही कहानी!
नहीं मिलेगा मरने को भी, चुल्लू भर पानी !!

मंगलवार, 19 मार्च 2013

नासमझ ! क्यूँ मारता है ? तू किसी को जान से !
मारना है गर तुझे तो, मार दे एहसान से !!
एक भाई दूसरे  का आज चारा बन गया,
भाई चारा ख़त्म है, इंसान का इंसान से!
जैसा बन्दे बोयेगा वैसा ही काटेगा फिर,
खौफ खा कुछ तो अरे अल्लाह से, भगवान् से!
मिलना एक दिन ख़ाक में, फिर क्यूँ करता है गुरूर,
क्या सिकंदर और क्या रावण उठ गए जहान से!
जो भी करना कर गुज़र, जिंदा रहते ही "कमल",
कौन आता लौटकर कब्र से, शमशान  से!

रविवार, 17 मार्च 2013

अह्देशबाब, मस्ती से भरपूर थे दोनों!
रहते बहके बहके से, नशे में चूर थे दोनों!!
प्यार पहले भी शीरीं था और आज भी शीरीं,
मुनक्का हो गए हैं अब, अँगूर थे दोनों!
अब तो रहते हैं खामोश , भेड़ की तरह,
गया वो दौर, उछलते कूदते लंगूर थे दोनों!
सवेरे मायके जाना, शाम तक लौट भी आना,
भले ही दूर दिन में, ना रात में दूर थे दोनों!
"कमल" अब याद आती वो प्यारी प्यारी सी सेहत,
छुआरे हो गए हैं सूख, कभी खजूर थे दोनों!!
( अह्देशबाब=यौवन काल में, शीरीं=मीठा )

शनिवार, 16 मार्च 2013

रोज़ उल्फत में होता इम्तिहाँ मेरा!
कौन समझेगा दर्द-ए-निहाँ मेरा!!
मह्शर में किससे क्या रखूँ उम्मीद,
जब वो अपना ना हुआ यहाँ मेरा!
मेरी ज़रुरत नहीं किसी को भी,
छुटा जाता है अब कारवाँ मेरा!
दिल का गुल उसने खिलने ना दिया,
बड़ा ही खुश है बागबाँ मेरा!
"कमल" जियेजा ज़िन्दगी यूँ ही,
अब ना ज़मीं ना आसमाँ तेरा!
(दर्द-ए-निहाँ =छिपा दर्द, मह्शर =जब बुरे भले का निर्णय होगा)
ना दिल में दर्द है, ना जिगर में दर्द है !
सच तो ये है शाम से कमर में दर्द है!
कोई एक जगह हो तो मालिश भी मैं करूँ ,
कभी है इधर में दर्द कभी  उधर में दर्द है!
जिससे भी मिलता मैं, वही दर्द है बताता,
मुझको तो लगता शायद घर घर में दर्द है!
कहते हैं होगा कम डॉक्टर के पास दर्द,
किसको बताऊँ उसके भी नश्तर में दर्द है!
अब क्या लिखूँ मैं और क्या नहीं लिखूँ ,
ये सोचके "कमल" अब सर में दर्द है!
(नश्तर=सुई )
कल जो मैखाने से पी के हम निकले!
लोग कहने लगे, आप छुपे रूस्तम निकले!!
कभी ये जिद ना जायेंगे दर-ए-मैखाना,
आज ये शौक वहीँ पे दम निकले!
वाह दुख्तर-ए-रिज़, मैं तो छूटा ग़मों से,
दिल में तू आई कि दिल से गम निकले!
लडखडाये नहीं थे वो अदब था हमारा,
तेरे दरवाजे से जो होके ख़म निकले!
शाम का मंजर "कमल" ने ये देखा,
भरे मैखाने, खाली दैर-औ-हरम निकले!
(दुख्तर-ए-रिज़=अंगूर की बेटी अर्थात मदिरा, ख़म होना=झुकना,मंजर=दृश्य,मैखाने=मधुशाला,दैर-औ-हरम=मंदिर और मस्जिद)

बुधवार, 13 मार्च 2013

आ ! नये साल के नये मौसम की यूँ शुरुआत करें!
जो अधूरी रही पिछली बार वो पूरी बात करें!!
बेकार ना जाने दे हम एक भी लम्हा इस बार ,
दिन को खुशनुमा और रंगीन अपनी रात करें!
हम भी जवाँ , दिल भी जवाँ और उमंगें भी जवाँ ,
बहकती फिजा में  कौन भला बस में जज़्बात करें!
ज़िन्दगी ऐसी हसीं मिलेगी फिर ना दोबारा,
चमन के फूल सब मिलके यही इशारात करें!
आगे ज़िन्दगी में एक से एक मोड़ आयेंगे "कमल",
फैसले ज़िन्दगी के जो भी हो मिलके साथ करें!

सोमवार, 11 मार्च 2013

फैसले देखे हैं हमने, अपनी ही तकदीर के!
पायी हैं क्या क्या सजायें, वो भी बे तकसीर के!
कोई माने या ना माने पर लिखा होता जुदा,
नसीब में गरीब के, नसीब में अमीर के!
वक़्त-ए-पीरी में मुझे भी अब तो ये लगने लगा,
एक से होते हैं दिल, तिफ़्ल के और पीर के!
एक ग़ज़ल छपवाने खातिर, अपनी मैं, किताब में,
हाये कितने काटे चक्कर दफ्तर-ए-मुदीर के!
राह -ए-इश्क पर "कमल" चलता रहूँगा उम्र भर,
हौसले तो कम नहीं हैं यारों इस राहगीर के !
(तकसीर=अपराध, वक़्त-ए-पीरी=बुढ़ापा, तिफ़्ल=बच्चा, पीर=बूढ़ा, दफ्तर-ए-मुदीर=संपादक का कार्यालय )

शनिवार, 9 मार्च 2013

मेरे सभी शिब भक्त मित्रों को मेरी ओर से "महा शिव रात्रि " की बहुत बहुत हार्दिक शुभ कामनाएं ...इस शुभ अवसर पर प्रस्तुत है मेरी एक भक्ति रचना .............

मुझे श्री चरणों में दे दो ठौर , शिव शंकर आशुतोष प्रभु !
रहा भोग-लिप्त मैं कितने दिन,
और व्यर्थ जिया तेरी भक्ति बिन,
धन धान्य दिया तुमने लेकिन, मुझको ना था संतोष प्रभु .....१
हो जिस पर तेरी दया दृष्टि,
गृह होती उसके सुख वृष्टि,
तांडव से काँप उठे सृष्टि , जब होता डमरू घोष प्रभु ................२
मैं पापी हूँ, मैं हूँ कामी,
प्रभु तुम तो हो अंतर्यामी ,
मैं आया तेरी शरण स्वामी, अब दूर करो मेरे दोष प्रभु ............३ 

हूँ तेरी ऋणी मैं, काग मेरे !

मैं समझ गयी तेरा सन्देश,
आने वाले हैं ह्रदय-नरेश,
फिर कट जायेगा विरह-क्लेश,
सोते जागेंगे भाग मेरे…….............१

तू प्रफुल्लित है करके काँव,
मैं जीत गयी हूँ प्रेम-दाँव,
नहीं आज धरा पर मेरे पाँव,
मन में उठते हैं राग मेरे .................२

जब होगी पी की कृपा-दृष्टि,
बरसेगी निरत सुख की वृष्टि,
आनंदित होवेगी सृष्टि ,
प्रकाशित होंगे विहाग मेरे ...............३

बस आज से तेरा ये मुंडेर,
नित रखूँगी मैं दाने बिखेर,
मेरे दूत सुना, सन्देश फेर,
नैनों में भरा अनुराग मेरे  ...............४
 

गुरुवार, 7 मार्च 2013

याद आता है मुझे, बचपन मेरा और मेरा गाँव ..............

सर्दी के मौसम में ज्यों ही, सुबह के नौ बजते थे,
सर पे टोपा , ऊनी कपडे, माँ के हाथों सजते थे,
करते थे हम मस्तियाँ, रहते थे बिलकुल बेफिकर,
दिन के छिपने से ही पहले आ ही जाते अपने घर,
पास आके चूल्हे के वो सेंकना फिर अपने पाँव ..............१

गर्मी के मौसम में लेके, साथियों का कारवाँ ,
कच्छा और बनियान में वो घूमना यहाँ वहाँ ,
जहाँ तहाँ जो बर्र दिखती, चलते पकड़ने शौक से,
और फिर कुएँ पे जाकर,  पानी पीते ओक से,
बैठ जाते नीम नीचे देखकर गहरी सी छाँव .....................२

बारिश के मौसम में थे, भीगते जी भर के हम,
और तैराते कश्तियाँ कागज़ की बनवा कर के हम,
गम ना था कि भीगने से हो भी सकते हैं बीमार,
भाग पड़ते थे मगर जब पड़ती थी ओलों की मार,
जाते घुस घर दूसरों के जैसे जिसका लगता दाँव .............३ 

मंगलवार, 5 मार्च 2013

काम का पुजारी हो , राम को दिया है भुला, नाम नहीं ध्यान नहीं ,कलि का प्रभाव है!
यामिनी में मोह की, कामिनी के संग लगा, दामिनी सा चंचल, मन का स्वभाव है!!
चरण पड़ संतों के, शरण में प्रभु की जा, हरण कर जितने भी, कुत्सित भाव है!
"कमल" मिले कैसे कृपा, सजल तो किये ना नेत्र, सकल हृदयों में आज, भाव का अभाव है!

सोमवार, 4 मार्च 2013

कोई भी शिकवा नहीं है कातिब-ए-तकदीर से !
इश्क के अंजाम से और ख्वाब की ताबीर से!!
चाहता हूँ, पर हँसी आती नहीं लबों पे अब,
इस क़दर जकड़ा हुआ हूँ, दर्द की ज़ंजीर से !
दोनों हैं अपनी जगह, तकदीर भी तदबीर भी,
जंग जारी है मगर, तकदीर की तदबीर से !
गर्दिश-ए-अय्याम ने किस तरह लूटा मुझे,
शक्ल मेरी मिलती ना, मेरी ही तस्वीर से!
वक़्त चाहे कैसा हो, ना गिरूँगा मैं "कमल",
अपनी ही नज़रों से और अपने ही जमीर से !
( कातिब-ए-तकदीर=भाग्य-विधाता,ताबीर=स्वप्न-फल, तदबीर=प्रयत्न, गर्दिश-ए-अय्याम=समय-चक्र)

शनिवार, 2 मार्च 2013

सुना दे ! रूप-यौवन की गाथाएं,
आज धर्म की वार्तालाप रहने दे!

मत कर तू विषाद की बातें,
कर बस प्रेम आह्लाद की बातें,
सुना दे ! मजनूँ फरहाद की बातें,
आज तू भरत -मिलाप रहने दे………. १

अभी से पंडितों की क्यों माने,
पाप और नर्क को वही जाने,
सुना दे ! लैला शीरीं के गाने,
आज तू सीता-विलाप रहने दे………. २

छवि तेरी है मेरे मन उतरी,
लिए मादकता भली सुथरी,
सुना दे! कोई प्यारी सी ठुमरी,
आज विरह का आलाप रहने दे……….३   
 

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

यदि तुम परिश्रम में तत्पर रहे तो,
सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी!

अटल तेरा निश्चय, अटल तेरा व्रत हो,
अटल धारणाएं, अटल तेरा मत हो,
आरूढ़ साहस के रथ पर रहे तो,
सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी ………. १

ध्येय से अपने तू विचलित ना होना,
क्षणिक होती बाधाएं चिंतित ना होना,
बस बढ़ता ही अपने पथ पर रहे तो,
सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी ....... .....२

ना भूले प्रण हम, वक्तव्य से पहले,
ना विश्राम करना, गंतव्य से पहले,
अडिग और निश्चल शपथ पर रहे तो,
सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी ..............३

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

अब तन की छोड़, मन की सुध ले !

तन गिरता जाता है निशदिन,
आयु घटती पल छिन पल छिन ,
मत अगले पिछले जन्म को गिन,
बस इस जीवन की सुध बुध ले!
अब तन की छोड़, मन की सुध ले………. १

ना मन में इच्छा किंचित कर,
बस शुभ  कर्मों को संचित कर,
चंचलता, मन से वंचित कर,
सन्यास लगन के आयुध ले !
अब तन की छोड़, मन की सुध ले…….......२

सुन! मन को अपने पवित्र बना,
शुभ संस्कारों के चित्र बना,
आत्मा को अपना मित्र बना,
कर मन को निर्मल और शुद्ध ले !
अब तन की छोड़, मन की सुध ले……… ..३ 

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

दफअतन खाया था दिल ने, उसकी नज़र के तीर को!
अब तलक ना चैन है, आशिक-ए-दिलगीर को!!
चौंकता हूँ, रोता हूँ, रातों में तन्हाई की,
क्या ज़माने को कहूँ , क्या कहूँ तकदीर को!
उतनी ही पाकीजगी से चाहता हूँ मैं तुझे,
मजनूँ ने लैला को और राँझे ने चाहा हीर को!
ऐ मुसव्विर! छोड़ अब, तू ना जानेगा कभी,
मत समझ कागज़ का टुकड़ा, यार की तस्वीर को!
प्यार करना आसाँ  है पर निभाना टेढ़ी खीर,
याद रखेगा ज़माना, "कमल" की तहरीर को!
(दफअतन=अचानक, आशिक-ए-दिलगीर=व्यथित ह्रदय वाला प्रेमी, पाकीजगी=पवित्रता, मुसव्विर=चित्रकार, तहरीर=लेखन)

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

जब जब मेरी धानी चुनरिया हवा में उड़ उड़ जाये !
.....................................मुसाफिर मुड मुड जाये !!
बालक देखे, वो भी चाहे, लुकाछुपी का खेल करे,
हर जवान का सपना ये ही, दिल से दिल का मेल करे,
आशिक बुड्ढा, पीता हुक्का, करता गुड गुड जाये !
.....................................मुसाफिर मुड मुड जाये !!......१
बच्ची थी, मैं तभी भली थी, फिर क्यूँ हाये जवान हुई,
मुझसे संभलती ना ये जवानी, मुश्किल में मेरी जान हुई,
हाथों से अब शर्म का दामन मुझसे छुड छुड जाये !
 .....................................मुसाफिर मुड मुड जाये !!......२
मेरे हुस्न की चमक दमक को कोई बिजली कोई आग कहे,
जब लहराए ज़ुल्फ़ मेरी तब कोई घटा कोई नाग कहे,
तौबा तौबा किसी के संग ना नैना  जुड़ जुड़ जाये !
.....................................मुसाफिर मुड मुड जाये !!........३ 
ले चल माँझी ! ले चल माँझी !
नाव सजाकर ले चल माँझी !!

पार नदी प्रीतम की नगरिया,
चली मैं लेकर प्रेम गगरिया,
नहीं किसी की लगे नजरिया,
मुझे छिपा कर ले चल माँझी !
नाव सजाकर ले चल माँझी !!........१

जग के बंधन भले ही रोके,
आज रहूँगी पिया की होके ,
चलते समय ना कोई टोके,
मुझे बचा कर ले चल माँझी !
नाव सजाकर ले चल माँझी !!........२

मुझे निभाना है प्रण अपना,
करना पूरा मिलन का सपना,
क्यों अब विरह-ताप में तपना,
मुझे बिठा कर ले चल माँझी !
नाव सजाकर ले चल माँझी !!.........३ 

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

क्या मिला आखिर मुझे, आकर के दिल्ली!
ताने देते हैं दोस्त, उड़ाते हैं खिल्ली!
तौबा तौबा ये दिल्ली की आबोहवा,
खराब होके रहेंगे जिगर और तिल्ली!
तौर भी घटने लगा निगाहों का,
धुएँ की जम गयी आँख में झिल्ली !
उसको पाने का ख्वाब क्या देखा,
लोग कहने लगे हैं शेख चिल्ली!
हम हकीकत से वाकिफ हैं "कमल",
शेर हो बाहर , घर में भीगी बिल्ली !
(आबोहवा=जलवायु, तिल्ली=प्लीहा)

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

ना मिलेगा ढूँढने से, बागबाँ मेरी तरह !
बाग़-ए-उल्फत को बचाता, पासबाँ मेरी तरह!!
एक ये भी दौर है, रोता हूँ अपने आप पर,
एक ज़माना था, नहीं था शादमाँ मेरी तरह!
इश्क है एक भारी पत्थर, मीर साहेब ने कहा,
फिर उठायेगा कोई नातवाँ मेरी तरह !
देख कर शबनम सुबह सोचके ये रह गया,
रोया कितना रात भर आसमाँ  मेरी तरह !
हाँ, "कमल" के बाद भी आयेंगे अहलेदिल बहुत,
पर किसी का ना लुटे कारवाँ मेरी तरह!
(पासबाँ =रक्षक, शादमाँ =प्रसन्न, नातवाँ =दुर्बल,शबनम=ओस, अहलेदिल =दिल वाले )

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

मत माँग मुझसे वापस, तस्वीर ख़ुदारा !
तस्वीर तेरी, के बिना नहीं मेरा गुज़ारा !!
तस्वीर तो तेरी तरह कभी रूठती नहीं,
रहती है जेब में नहीं करती किनारा !
तुम तो जहाँ के काम में मसरूफ रहते हो,
तन्हाईयों में, सिर्फ इक तस्वीर सहारा !
तेरी तरह लबों पे इनकार भी नहीं,
तस्वीर की अदा ने हमको तो है मारा!

कई मायनो में तुझसे, तस्वीर है बेहतर,
तस्वीर करूँ वापस ना "कमल" को गँवारा !
(खुदारा=भगवान् के लिये, मसरूफ=व्यस्त)

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

हम तो माटी के पुतले हैं होती है इबादत क्या जाने !
दुनियादारी में ऐसे फँसे उस रब की अज्मत क्या जाने!!
ये पीर, मौलवी, वाइज सब मालिक के भेद को पा ना सके,
कब हो जाये और कैसे हो मालिक की रहमत क्या जाने!
उसके दस्तों में खलकत है डोरी है चाँद सितारों की ,
हम लाखों ढेर गुनाहों के आका की इज्जत क्या जाने!
बस अपने दिल को पाक बना वो अल्ला बड़ा ही अकबर है,
किस दिल पर उसकी हो जायेहम नजर-ए-इनायत क्या जाने!
है दिल में हमारे याद-ए-खुदा और नाम-ए-खुदा होंटों पर है,
कुछ और "कमल" मालूम नहीं होती है अकीदत क्या जाने !
(अज्मत =महानता ,वाइज =धर्मोपदेशक , दस्त=हाथ, खलकत=संसार, निजाम=प्रबंध, आका=स्वामी, पाक=पवित्र, अकबर=श्रेष्ठ, अकीदत=श्रद्धा )

शनिवार, 19 जनवरी 2013

बड़ी जब याद आती है मुझे दिलबर की रह रह कर!
सूख जाते हैं गालों पर मेरे आंसू ये बह बह कर !!
जुदाई होती उल्फत में, दिल-ए-नादाँ सबर कर ले,
गया थक मैं तो समझाके यही इस दिल को कह कह कर!
ज़माना कहता है मुझसे कभी तो मुस्कुराया कर,
कोई मुस्काएगा कैसे गम-ए -फुरकत को सह सह कर!
तमन्ना डूबती जाती सभी सैलाब में गम के,
किसी मुफलिस का घर जैसे गिरे बारिश में ढह ढह कर!
बड़ा होगा तेरा एहसाँ "कमल" के घर कभी आओ,
ज़रा खुल जायेंगे वो भी रखे बिस्तर जो तह तह कर !

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

आया क्या याद जो आँखों से अश्क फिर निकला ! 
एक कतरे में से ये आब तो वाफिर निकला!!
साथ में दिल के होश भी खो बैठा,
तेरे कूचे से गुज़रता जो मुसाफिर निकला!
क़दम क़दम पे मेरे दिल को शिकस्त मिली,
और वो होंगे दिल जिनका ज़ाफिर निकला!
मेलजोल क्या बढ़ा ज़रा हसीनों से,
ज़माना कहता है देखो "कमल" काफिर निकला!
(आब=पानी, वाफिर=बहुत अधिक, शिकस्त=पराजय, जाफिर=विजयी, काफिर=पापी )