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सोमवार, 26 नवंबर 2012

रातें रंगीं हो जाती दिन हो जाते रूपहले!
अगर हम दोनों मिल जाते थोडा और जो पहले!!
एक दूजे के पहलू में काट लेंगे उमर अपनी,
मुबारक दुनिया को उनके ये महल दुमहले!
मुक़द्दस उस घडी का बस एक इन्तिज़ार है हमको,
जब मैं अपनी कह लूँगा और अपनी को तू कहले!
यहाँ के लोग चलते हैं चालें ताश की मानिंद,
ज़रा सा भी मिला मौका डालते नहले पे दहले!
"कमल" की ये गुजारिश है साथ ना छोड़ना मेरा,
नाम सुनकर जुदाई का बड़ा ज़ोरों से दिल दहले!
(मुक़द्दस=पवित्र, मानिंद=तरह, गुजारिश=प्रार्थना)

शनिवार, 24 नवंबर 2012

दिल को अदाओं से बहलाये  रखना!
अच्छा नहीं यार तडपाये रखना!!
दोनों ही हम एक दूजे की जाँ है,
लगता है अच्छा कहलाये रखना!
बिखराके जुल्फें शाने पे मेरे,
रातों को मेरी महकाये रखना!
लगे ना नज़र ज़माने की तुझको,
घूँघट को थोडा सा सरकाये रखना!
लगता है जैसे कई साज़ बजते,
चूड़ी को अपनी खनकाये रखना!
हाँ हो जाये मस्त ये मस्ताना तेरा,
आँखों से मस्ती छलकाये रखना!
होशोहवास मैं जब तक ना खो दूँ ,
आँचल ये रंगीं  ढलकाए रखना!
ना ईमां बचा जो देखा "कमल" ने,
अदा से कमर को बलखाये रखना!

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

हाँ, उसी रोज़ ये हो गया खुलासा था !
वादा नहीं था वो झूठा दिलासा था!!
ये मेरी तकदीर थी या तगाफुल तेरा,
बना नासूर अब ज़ख्म जो ज़रा सा था!
मेरी जानिब ना आया कोई जाम, जबकि,
तुझे मालूम था कौन कितना प्यासा था!
एक ही झटके में हार गया सब कुछ,
वाह री किस्मत क्या तेरा पासा था!
रहा ना अब तो किसी काम का "कमल",
प्यार से पहले मैं भी अच्छा ख़ासा था!
(तगाफुल=लापरवाही,जानिब=तरफ )

बुधवार, 21 नवंबर 2012

आखिर कुबूल हो गयी दिल की मेरी दुआ!
है शुक्र उस खुदा का, दीदार तो हुआ!!
कोना कोना दिल का हुआ रोशन,
जब पड़ने लगी उसके चेहरे की शुआ!
जीत गयी जिंदादिली ज़माने से,
करता भी क्या ये आखिर ज़माना मुआ!
बातों बातों में उसने हामी भर ली,
मानो कि जैसे जीता, हारता जुआ!
उमंगें छूने लगी आसमान "कमल",
आपस में जब लबों ने लबों को छुआ!
(दीदार=दर्शन, शुआ=किरण)

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

मेहनत करके इंसां ने सब कुछ तलाशा है!
बना डाला देवता भी जब पत्थर तराशा है!!
वज़न कोई नहीं है आजकल लोगों की बातों में,
अगर इस पल में है तोला तो अगले पल में माशा है!
ये दुनिया फेंक भी ना दे और खाने भी ना पाएं
ना बनना नीम है तुझको ना बनना बताशा है!
रहना खुश है गर प्यारे याद करले सबक ये तू,
ना रख उम्मीद लोगों से ना करनी कोई आशा है!
"कमल" ने खूब देखे है रंग दुनिया-ए -फानी के,
कभी बनती तमाशाई कभी खुद ही तमाशा है!

सोमवार, 19 नवंबर 2012

हो गया है मेहरबाँ मुझ पे मेरा नसीब अब !
हट गये हैं रास्ते से मेरे सब रकीब अब!!
शाम हो गयी है यारों अपने घर को जाओ तुम।
वक़्त जाया ना करो, शब्-ए-वस्ल है करीब अब!
मेरा दिल लगने लगा है अब तो बाग़-ए -दुनिया में,
जाक गये हैं भाग सब, गाती अंदलीब अब!
जब तेरी सुनता था मैं हो गया वो दौर ख़त्म,
बातें तेरी नासेहा लगती है कुछ अजीब अब!
मिल गयी मुझको तो दौलत प्यार की, वफाओं की,
कौन कहता है बताओ "कमल" है गरीब अब!
(रकीब=दुश्मन या प्रेमिका का दूसरा प्रेमी, जाया=व्यर्थ, शब्-ए -वस्ल=मिलन की रात, जाक=कौआ ,अंदलीब=कोयल,नासेहा=धर्मोपदेशक)

शनिवार, 17 नवंबर 2012

क्या ये दौर वक़्त-ए -नाज़ुक का नहीं?
उसके मुश्ताक हैं सब, इक्का दुक्का नहीं!!
प्यार से समझाओ दिल को बच्चे की तरह,
हर बात का इलाज लात या मुक्का नहीं!
उसने इक निगाह डाली, हमने दिल दे दिया,
बिलकुल , तीर था वो , कोई तुक्का नहीं!
अय मर्ग ज़रा ठहर दो कश  तो मार लूं,
शायद कि दस्तियाब जन्नत में हुक्का नहीं!
"कमल" सा आशिक ना देखा जहाँ में,
महफ़िल में इस बात का यूँ ही रुक्का नहीं !
(मुश्ताक=चाहने वाला, मर्ग =मौत, दस्तियाब=उपलब्ध, रुक्का=शोर)

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

ज़िन्दगी एक बाँसुरी है

चलो माना कि "ज़िन्दगी एक बाँसुरी है "!
प्यार का राग ना गाया तो फिर बेसुरी है!!
बदला ना देना गलत का गलत से,
दे देना माफ़ी बड़ी बहादुरी है!
बदलती ही रहती है रंग अपने दुनिया,
कभी है भली तो कभी ये बुरी है!
चुराके मेरा दिल है कितने खुश वो,
खुश मैं भी, भले चीज़ मेरी चुरी है!
"कमल" बच के रहना ऐसे लोगो से,
मुँह में है राम और बगल में छुरी है!
जब तक तेरा मेरा जहान में वजूद रहेगा !
ये जज्बा-ए -इश्क भी यूँ ही मौजूद रहेगा!!
राह-ए-उल्फत में हम पा ही लेंगे एक दिन,
कारवाँ,  जानिब-ए -मंजिल-ए -मक़सूद रहेगा!
हसरत -ए -दीदार पूरी होते ही बढ़ जाती है,
सिलसिला ये, मिसाल-ए -सूद दर सूद रहेगा!
जब भी हम मिलेंगे तो मिलेंगे खुलकर,
ना कोई तकल्लुफ, ना ऐलान-ए -हदूद रहेगा!
आ जाओ, अभी तो चिराग-ए -चश्म है रोशन,
"कमल" ना रोशनी और ना फिर दूद रहेगा!
(जज्बा-ए -इश्क=प्रेम भावना, जानिब-ए -मंजिल-ए -मक़सूद=इच्छित लक्ष्य की ओर , मिसाल-ए -सूद दर सूद=चक्रवृद्धि ब्याज की तरह, ऐलान-ए -हदूद=सीमा की घोषणा , दूद=धुआं )

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

सखी ! वो क्यों नहीं आये आज?
कुछ भी नहीं हुई थी अनबन,
भूल गये वो प्रीत का बंधन,
किसके लिए रहूँ मैं बनठन,
बिन उनके, सब बिगड़े काज......१
सूना आंगन शैया सूनी,
जलता ह्रदय जैसे हो धूनी,
मन की व्यथा हुई है दूनी,
आज विरह का छाया राज..........२
आयेंगे वो , मत दे दिलासा,
मन भी प्यासा, तन भी प्यासा,
बढती जाये प्रेम-पिपासा,
कहूँ क्या आगे, आये लाज.........३
....रचियता:कमल शर्मा

सोमवार, 12 नवंबर 2012

आठों पहर

आठों पहर अब तेरे ही ख्वाब-औ-ख्याल है!
हमको जुदा करे जो, किसकी मजाल है!!
तेरे बिना अधूरा है फ़साना-ए-ज़िन्दगी,
है मुस्तकबिल तू मेरा और तू ही हाल है!
तू साथ ना था जब तक कोई बात नहीं थी,
अब तेरे बगैर दिलबर जीना मुहाल है!
तेरा इश्क मैंने पाया जो बेशकीमती है,
क्यूँ ना कहूँ मैं ये दिल मालामाल है!
लिखना ग़ज़ल सिखाया मुझे तेरी अदा ने,
कहने लगी दुनिया "कमल" तो कमाल है!
(मुस्तकबिल=भविष्य, हाल=वर्तमान)

कवित्त

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मन की उमंग में, ह्रदय की तरंग में, दीयों के संग में, आयी है दीपावली!
आनंद अपार सा, प्रेम का संचार सा, नया संसार सा, लायी है दीपावली!!
निर्धन धनिक को, व्यापारी बनिक को, बेचते मनिक को, भायी है दीपावली!
"कमल" के कवित्त में, जन मानस के चित्त में, रुपया पैसा वित्त में, छायी है दीपावली!!
(दीया=दीपक, धनिक=धनवान. बनिक=बनिया, मनिक=मणि, वित्त=धन)
सभी मित्रों को कमल शर्मा की ओर से दीपावली की ढेर सारी शुभ कामनायें......
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शनिवार, 10 नवंबर 2012

हो मुबारक ये दिवाली

रोशनी सूरज से लेकर,
आओ ! जलायें यूँ चिराग!
और जला डाले, दिलों पे,
लग गए जो गम के दाग!!
आओ! अब की बार ये,
खाएं दिवाली पर क़सम!
जब तलक मंजिल नहीं,
रुक के हम ना लेंगे दम!
फूलझड़ी से जगमगाओ,
पटाखों चरखी के शोर से!
हो मुबारक ये दिवाली,
तुमको "कमल" की ओर से !

...इम्तिहाँ मेरा

रोज़ उल्फत में होता इम्तिहाँ मेरा!
समझता कोई नहीं दर्द-ए-निहाँ मेरा !!
महशर में किस से क्या रखूँ उम्मीद,
जब वो अपना ना हुआ यहाँ मेरा!
नहीं है मेरी ज़रुरत किसी को भी,
छुटता जाता है अब कारवाँ मेरा!
दिल का गुल उसने खिलने ना दिया,
तोड़ के खुश है बागबाँ मेरा !
"कमल" जियेजा ज़िन्दगी को यूँ ही,
अब ना ज़मीं तेरी, ना आसमाँ तेरा!

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

...चश्मा

सिर्फ मुझ पर नहीं कितनो पे कहर ढाएगा,
धूप में तेरा निकलना, लगा काला चश्मा!
खड़ा हूँ देर से मैं तेरी गली के नुक्कड़ पर,
तू भी आजा ज़रा, घरवालो को दे चकमा!
साथ में चल तू मेरे शाने पे हाथ रख कर,
बैठने दे, जिसके बैठता है दिल पे सदमा!
दुनिया वालो तुम जिसको समझते हो चाँद,
दरअसल वो है मेरे यार के कमीज़ का तकमा!
"कमल" ने पढ़ लिए चार लफ्ज़ मोहब्बत के,
बरहमन मंत्र पढ़े, शैख़ जी पढ़े कलमा !
(कहर=मुसीबत, चकमा देना=बहकाना, शाने=कंधे, तकमा=बटन,लफ्ज़=अक्षर, बरहमन=पुजारी ब्राह्मण, कलमा=मुस्लिम श्लोक )

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

...चैन मेरा छीन के

जब से बेदर्दी गया वो चैन मेरा छीन के!
ख्वाबों की रातें गयी दिन गये तस्कीन के!!
उलझनों में इश्क की किस क़दर उलझे रहे,
ना ही दुनिया के रहे, ना रहे हम दीन के!
आजू बाजू घूमते थे जो मेरे बन कर के दोस्त,
भेद लेकिन खुल गया साँप थे आस्तीन के!
इस जहाँ ने तो उड़ाया मेरी उल्फत का मज़ाक,
काश दुनिया देख पाती बल मेरे जबीन के!
वक़्त पूरी ज़िन्दगी में वो ही अच्छा था "कमल",
जो गुज़ारा था कभी पहलू में उस हसीन के!
(तस्कीन=आराम, कदर=तरह, दीन=धर्म, बल=सिलवट, जबीन=माथा)

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

कैसे हो?

कैसे हो? पूछा उसने, मुझसे मिलाके हाथ!
मैंने कहा, "दुआ है", थोडा दबा के हाथ!!
जन्नत में घूम रहा हूँ, एहसास ये हुआ,
काँधे पे रख दिया जब, उसने घुमा के हाथ!
फैली हुई सब मस्ती, सिमट आयी एक जा,
सीने से जो लगाया, दोनों फैला के हाथ!
दुनिया ही हिल गयी मेरी, जब उसने ये कहा,
चलते  है अब, अलविदा, हवा में हिला के हाथ!
फिर जान भी छोड़ देगी, "कमल" के जिस्म को,
ना जाना जानेमन, मुझसे छुड़ा के हाथ!
(जा=जगह)

सोमवार, 5 नवंबर 2012

हर वक़्त...

हर वक़्त यूँ ना नसीब को कोसा कीजिये!
कोई ना बड़ा रब से है, भरोसा कीजिये!!
बच्चों की तरह मुश्किल है रिश्ते सँभालना,
रिश्तों को भी ज़रा पाला-पोसा कीजिये!
गर तेरे दर पे आये कोई भूखा प्यासा शख्स,
रूखा या सूखा जैसा हो परोसा कीजिये!
ना ना की बात ठीक नहीं वस्ल की शब् में,
जिद छोड़, कुबूल इल्तिजा-ए-बोसा कीजिये!
बदले हैं सिर्फ शौक़ पर मैं तो हूँ वही,
सुलूक "कमल" के साथ अपनों सा कीजिये!

शनिवार, 3 नवंबर 2012

मैं क्या...

मैं क्या, किसी को भी कर देंगे पागल,
ये मेहंदी के हाथ, महावर के पाँव !
ग़मों से झुलसते को राहत मिलेगी,
जो मिल जाये तेरी जुल्फों की छाँव!
तेरे ख्वाब, तेरे ख्याल, तेरी ही यादें,
लो बसने लगा है मेरे दिल का गाँव!
तेरी बोली प्यारी कोयल की कुहू सी,
ज़माना है कौआ करे काँव-काँव !
ये मेरी है किस्मत कि जीतूँ या हारूँ,
"कमल" ने लगा डाला उल्फत का दाँव!

कोई नहीं इस जहान में

मेरे यार जैसा कोई नहीं इस जहान में !
कम है, कितना भी लिखूँ उसकी शान में!!
हो जाये वो खफा तो निकल जाती मेरी जान,
जो हो जाये मेहरबाँ, जान आ जाये जान में!
गर बात करूँ उस से तो करता ही रहूँ मैं,
एक शहद सा टपकता उसकी ज़बान में!
दुनिया में हसीं देखे हैं यूँ तो बेशुमार,
पर बात ही अलग उसकी आन-बान में!
गर वो नहीं , "कमल" का भी वजूद कुछ नहीं,
कोई रस नहीं शेर,ग़ज़ल और दीवान में!
(वजूद=अस्तित्व, दीवान=काव्य-संग्रह)