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शनिवार, 19 जनवरी 2013

बड़ी जब याद आती है मुझे दिलबर की रह रह कर!
सूख जाते हैं गालों पर मेरे आंसू ये बह बह कर !!
जुदाई होती उल्फत में, दिल-ए-नादाँ सबर कर ले,
गया थक मैं तो समझाके यही इस दिल को कह कह कर!
ज़माना कहता है मुझसे कभी तो मुस्कुराया कर,
कोई मुस्काएगा कैसे गम-ए -फुरकत को सह सह कर!
तमन्ना डूबती जाती सभी सैलाब में गम के,
किसी मुफलिस का घर जैसे गिरे बारिश में ढह ढह कर!
बड़ा होगा तेरा एहसाँ "कमल" के घर कभी आओ,
ज़रा खुल जायेंगे वो भी रखे बिस्तर जो तह तह कर !

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

आया क्या याद जो आँखों से अश्क फिर निकला ! 
एक कतरे में से ये आब तो वाफिर निकला!!
साथ में दिल के होश भी खो बैठा,
तेरे कूचे से गुज़रता जो मुसाफिर निकला!
क़दम क़दम पे मेरे दिल को शिकस्त मिली,
और वो होंगे दिल जिनका ज़ाफिर निकला!
मेलजोल क्या बढ़ा ज़रा हसीनों से,
ज़माना कहता है देखो "कमल" काफिर निकला!
(आब=पानी, वाफिर=बहुत अधिक, शिकस्त=पराजय, जाफिर=विजयी, काफिर=पापी )