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बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

...उसके यहाँ

मेरे अरमानों की कीमत कुछ नहीं उसके यहाँ !
अब मैं टुकड़े टूटे दिल के लेके जाऊँ कहाँ !!
क्या खबर थी इश्क में आयेगा ऐसा भी दौर,
है जहाँ इकरार बसता, इनकार भी होगा वहाँ !
बदनसीबी ना कहूँ तो क्या कहूँ फिर मैं इसे,
पास में मंजिल के जाके लुट गया है कारवाँ !
दुनिया की नज़रों से छुपके था बसाया घोंसला,
बिजलियों को है बताया किसने मेरा आशियाँ!
वक़्त ही कर देगा इसको खत्म अब अय "कमल",
फासला जो थोडा सा आ गया है दरमियाँ !

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

...किताब में

प्यार अब तो रह गया कहानी में, किताब में!
दब गया है सहरा में , डूब गया चिनाब में!!
अपने तो नसीब में शायद लिखे थे खार ही,
लेने वाले ले गये जो खुशबू थी गुलाब में!
औरों से जब वो मिला तो मिला दिल खोल कर,
मेरी किस्मत ये रही मुझसे मिला नकाब में!
भूले से आ जाता हूँ जो मैं साहिल पर कभी,
फिर पटकती मौज-ए-वक़्त गम के ही सैलाब में!
कहो "कमल" कैसे हो? पूछा उसने ख़त में ये,
कोई बतलाओ ज़रा क्या लिखूँ जवाब में!
(सहरा=रेगिस्तान जहाँ मजनूँ मारा मारा फिरता था, चिनाब=वो नदी जिस में सोहनी महिवाल डूब गए थे, खार=काँटे, साहिल=किनारा, मौज-ए-वक़्त=समय की लहर, सैलाब=बाढ़)

सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

किस्से...

किस्से नहीं है रास दुनिया-ए-अजीब के!
सुनने पड़े हैं ताने अक्सर हबीब के !!
था वादे का वो पक्का और पहुंचा वक़्त पर,
पर मेरे घर ना होकर, घर पर रकीब के!
रातें हैं कटती तन्हा दिन भी गुज़रता खाली,
शब्-औ-रोज़ हो गए गिरफ्त में नसीब के!
खुद ही दिया था उसने अपने निकाह का ख़त,
अरमान यूँ लुटे है देखो गरीब के!
अब बख्त है मुखालिफ तो "कमल" के रिश्तेदार,
सब हो गए हैं दूर जो थे करीब के !
(हबीब=मित्र, रकीब=शत्रु, शब्-ओ-रोज़=रात-दिन, बख्त=भाग्य, मुखालिफ=विपरीत)

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

...मेरा दिल ये आ गया

लो फिर किसी हसीन पर मेरा दिल ये आ गया !
अदाएं उसकी भा गयी, जलवा उसका भा गया!!
मिलाकर आँखों से आँखें बात करना वो ज़ालिम का,
कैफियत कम नहीं जिसकी नशा कुछ ऐसा छा गया,
झलकता साफ़ था उसका बदन का एक एक वो ख़त,
तंग वो पैरहन उसका क़यामत मुझ पे ढा गया !
मिला जब हुस्न ऐसा है करूँगा इश्क जी भर के,
ये माना इश्क ख़ूनी है अच्छों अच्छों को खा गया !
"कमल" तो मर ही चुका था गम-ए-दुनिया की चोट से,
रोज़ कुछ और जीने का बहाना फिर से पा गया !
(कैफियत=आनंद, ख़त=रेखा-चिह्न, पैरहन=पहनावा, क़यामत=प्रलय, रोज़=दिन)

शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

...समां चुके हो तुम

आँखों में पहले, फिर दिल में, अब रूह में समां चुके हो तुम !
ना उतरेगा ये प्यार का रंग, इस तरह से रमा चुके हो तुम !!
ये सोच के मैंने चूमा है, अपने हाथों को कई दफा,
ये हाथ वही जिन में अपने हाथों को थमा चुके हो तुम !
हरदम माँगूं बस यही दुआ, दम निकले तो तेरी बाँहों में,
अपने दम से मेरे दिल की दुनिया दमदमा चुके हो तुम !
क्या ख़ाक कमाया दुनिया में, इज्जत ना कमाई जो तुमने,
कहने को लाख करोड़ सही कितना ही कमा चुके हो तुम !
ये आज की तेरी ग़ज़ल "कमल" रखेगा ज़माना बरसों याद,
अपने शेरों से रंग ऐसा महफ़िल में जमा चुके हो तुम !

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

मेरा जनाज़ा...

मेरा जनाज़ा गुज़रता जो उसके मकान से निकला !
पूछते हैं, किसका है? जो इतनी शान से निकला !!
मुझको एहसास फिर भी गुलिस्ताँ का हुआ,
भले ही काफिला मेरा बियाबान से निकला!
कभी खाली ना गया ये मेरा दावा है,
जब कोई तीर उस शोख की कमान से निकला !
सिर्फ रह जायेंगे बस स्याही भरे ही पन्ने,
जो उसका ज़िक्र-ओ-नाम मेरे दीवान से निकला!
शेर कहते है ये उसको दुनिया वाले.
मस्ती में जो जुमला "कमल" की ज़बान से निकला !
(शोख=चंचल लड़की, दीवान=काव्य-संग्रह, जुमला=वाक्य)

बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

याद है ?

खेतों के वो रास्ते और पगडंडी ! याद है ?
प्यार की गाडी को जब दी थी झंडी ! याद है?
सुबह से ही रहता था हमको इन्तिज़ार शाम का,
और फिर तेरा मिलने आना सब्जी मंडी ! याद है?
तेरा वो नज़रें झुकाना और वो मुस्काना फिर,
मेरा भी भरना धीरे से आहें ठंडी ! याद है?
याद कर जब रात में बैठे थे छुपके कोने में,
आके वो चौकीदार का खड्काना डंडी ! याद है?
दुनिया की नज़रों से दूर प्यार को रखना "कमल"
करती नफरत प्यार से दुनिया घमंडी ! याद है?

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

...मेरा मुस्तकबिल है तू !

तेरा माजी जो भी हो मेरा मुस्तकबिल है तू!
फैसला ये दिल का है, प्यार के काबिल है तू!!
कच्चे पक्के रास्तों पर अब तलक भटका किया,
हो गया बेफिक्र मैं मिल गयी मंजिल है तू!
सादगी चेहरे पे और आँखों में शर्म-ओ-हया,
झूठा है, जो कहता है कि कातिल है तू!
रह नहीं सकता हूँ जैसे जिंदा मैं बिन साँस के,
इस तरह से ज़िन्दगी में हो गयी शामिल है तू!
प्यार मुझको क्या हुआ कहने लगे है दोस्त सब,
अय "कमल" अब हो गया हमसे क्यूँ गाफिल है तू!
(माजी=अतीत, मुस्तकबिल=भविष्य)

सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

मुक़द्दर...

मुक़द्दर राह-ए-जीस्त में कैसे मोड़ देता है !
पकड़ता एक है दामन, दूसरा छोड़ देता है !!
लोग मिलते ही रहते हैं कभी कैसे कभी कैसे,
कोई दिल जोड़ देता है, कोई दिल तोड़ देता है !
ज़माना भी यहाँ पर चाल चलता है दोरंगी,
कभी रखता छुपाके कभी भांडा फोड़ देता है !
ये भी सच है कि मंजिल मिलती उसको है,
इरादा करके जो पक्का लगा दौड़ देता है !
"कमल" जब भी करो प्यार सच्चा ही करना,
सच्चा प्यार ही बन्दे को रब से जोड़ देता है !
(राह-ए-जीस्त=जीवन-मार्ग )

रविवार, 21 अक्तूबर 2012

मेरा दावा...

यही है मेरा दावा भी यही मेरा यकीन है !
कि मेरे यार के जैसा नहीं कोई हसीन है !!
फैसला हो गया होगा अब तो फरिश्तों में,
कि बढ़के हूर-ए-जन्नत से कहीं हूर-ए-ज़मीन है !
रुख-ए-रोशन के क्या कहने चाँद भी रश्क करता है,
फलक के चाँद से उजला मेरा माहेजबीन है !
ग़जल कैसे ये लिखता मैं, ना होते वो ज़माने में,
उन्हीं के दम से ही यारों मेरी दुनिया रंगीन है !
नहीं देखा नहीं देखा, हुस्न है या क़यामत है,
"कमल" तू ही नहीं, सब ही, कहते आफरीन है !
(रुख-ए-रोशन=ओजस्वी मुखमंडल, रश्क=ईर्ष्या, फलक=आकाश, माहेजबीन=चाँद जैसे मस्तक वाला, क़यामत=प्रलय, आफरीन=शाबाश, वाह )

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

लिखने की आदत...

लिखने की आदत मेरी गंदी सही !
आज ग़ज़ल नहीं, तुकबंदी सही !!
आ दोनों मिलके दुआ माँगते हैं,
मैं बंदा खुदा का, तू बंदी सही !
ना करो तर्क-ए-ताल्लुकात हमसे,
दोस्ती ना सही, भाई बंदी सही !
जलवे देखो मगर अदब के साथ,
हुस्न की इश्क पे पाबंदी सही !
जान भी दे दे "कमल" उनको,
भले ही जाती है मंदी सही !!
(तर्क-ए-ताल्लुकात=सम्बन्ध - विच्छेद )

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

...सिर्फ सात नहीं

रहूँगा हर जनम मैं साथ , सिर्फ सात नहीं !
अलग होती हुस्न से इश्क की जात नहीं !
नहीं डूबेगा, नहीं डूबेगा, सफीना-ए- इश्क मेरा,
सातों समंदर मिल के डुबो दे इतनी औकात नहीं !
ख्याल-ए-जुदाई भी तुम अपने दिल में ना लाना,
सातों दिन अपने हैं, एक दिन या एक रात नहीं !
एक प्यार के ही रंग में सारे रंग है शामिल ,
सातों रंग धनुक के करते क्या इशारात नहीं !
देखना प्यार "कमल" अपना  बुलंदी पे जायेगा,
सातों आसमानों से आगे, वरना कोई बात नहीं !
(जात=जाति, सफीना-ए-इश्क=प्रेम की नाव, इशारात=संकेत, धनुक=इन्द्र धनुष )

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

ग़ज़ल

क्या रदीफ़,काफिया, मतला, बहर, मकता है!
जिसको इल्म है वो ही ग़ज़ल लिख सकता है !
थक के जो बैठ गया उसे मंजिल कहाँ नसीब,
सही मुसाफिर ना मंजिल से पहले थकता है!
छकते होंगे तेरे मयकश तेरी महफ़िल में,
ये निगाहों से पीने वाला कहाँ छकता है !
सीख लो कोई हुनर मेरी मानो तो प्यारों,
एक अच्छा हुनर कई ऐबों को ढकता है!
हर एक शेर लिखा खिरद से सलाह लेकर,
भले ही लोग कहे "कमल"  तो बकता है !
(खिरद=बुद्धि )

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

...जुड़ गया

आशिकों में उसके मेरा भी नाम जुड़ गया !
उसके दिलेखास से मेरा दिलेआम जुड़ गया !!
कुछ जल्दी पहुँच जाता हूँ अब उसकी गली मैं,
रफ़्तार बढ़ गयी मेरी या रस्ता सिकुड़ गया!
उसकी नज़र का जादू नहीं है तो क्या है ये,
दिल उसका हो गया और मुझसे बिछुड़ गया!
उम्मीदवार कितने ही थे उसके जलवों के,
ज़हेनसीब उसका रुख मेरी जानिब मुड गया !
है रंग गया "कमल" तो उसके ही रंग में अब,
गैरों के चेहरे देखो, रंग ही है उड़ गया !!
(दिलेखास=महत्वपूर्ण ह्रदय, दिलेआम=साधारण ह्रदय, रफ़्तार=चाल, ज़हेनसीब=अहोभाग्य, रुख=झुकाव, जानिब=तरफ)

रविवार, 7 अक्तूबर 2012

...रोता हूँ

याद आता है यार...रोता हूँ !
किया था क्यूँ ये प्यार...रोता हूँ !!
दिल को एक बार मैं लगा बैठा,
दिल को अब बार बार...रोता हूँ!
बड़ा संभाल के रखा था दामन,
हो गया तार तार...रोता हूँ!
अब तो तेरा ही बस सहारा है,
मेरे परवरदिगार...रोता हूँ!
आँसू आते हैं तो रुकते ही नहीं,
"कमल' मैं जार जार ...रोता हूँ !

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

वो दिन...

वो दिन ख़ाक दिन जो यार से बात ना हो!
खाली सा वक़्त गुज़रे और मुलाक़ात ना हो!!
गुज़रता है एक एक पहर क़यामत की तरह,
ना, किसी के नसीब में ऐसी रात ना हो!
दिल की चाहत ना ज़माने में कभी जाहिर हो,
रहे ख्याल ये, रुसवा तेरे जज़्बात ना हो!
यार हो साथ में और सोये मुँह फेर कर,
इस क़दर पैदा ज़िन्दगी में हालात ना हो!
"कमल" तो खुश है यार मिलनसार मिला,
ज़िन्दगी बेकार लगे जो उसका साथ ना हो!