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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

यूँ खनकते आज कल खुल्ले सिक्के जेब में।
घुँघरू जैसे बजते हो शोख़ की पाज़ेब में ।।
कहते रहते थे बुज़ुर्ग बेटा चलना जोड़ के,
हो गया शुमार अब हुनर भी ये ऐब में।
सोचता हूँ जोड़ लूँ बिटिया की शादी के लिए,
पर कहीं फँस ना जाऊँ फिर  किसी फरेब में,
फायदा क्या? बाजार में जब खुला मिलता नहीं,
नोट को कर गुलाबी लगे हो ज़ीनत ओ ज़ेब में।
हालात जायेंगे सुधर, कहती दुनिया सब्र कर,
शायद कुछ अच्छा छुपा हो "कमल" इस शकेब में।

(जेब = पॉकेट , शोख़=चंचल लड़की, पाज़ेब=पायल, शुमार=गिनती में, हुनर=गुण , ऐब=दुर्गुण , फरेब=धोका, ज़ीनत ओ ज़ेब =सौन्दर्य और सुंदरता, शकेब =धैर्य )

शनिवार, 30 जुलाई 2016

 ........ मेरा रफ़ी चला गया !

खज़ाना -ए -मौसिकी का एक अशरफी चला गया !
चला गया , चला गया , हाये मेरा रफ़ी चला गया !!

मन्दिर में गूँजती है आवाज -ए -मुसलमान ,
वो गाके 'मन तड़पत' इंसान -ए -अफी चला गया !

अक्सर तो आदमी को भी खाती है रोटियाँ ,
गा गा के ऐसी नज़्म वो फ़लसफ़ी चला गया !

वो हक़ -ए -मल्कियत के झगडों से दूर था ,
बस क्या कहूँ मैं अज़ीम -औ -शफी चला गया !

आवाज़ की दुनिया का बादशाह था "कमल",
दरबारी राग गा अहल -ए -सदा -ए -सफी चला गया !

(खज़ाना -ए -मौसिकी = संगीत-कोष , अशरफी = सोने का सिक्का , मन तड़पत = फिल्म 'बैजू बावरा ' में रफ़ी साहब ने 'मन तड़पत हरि दरशन को आज' गीत गाया था। ये गीत लिखा भी एक मुसलमान (शकील बदायूँनी ) ने संगीत भी एक मुसलमान (नौशाद साहब ) का था और गाया भी एक मुसलमान (रफ़ी साहब) ने लेकिन बजता है हिन्दुओं के मन्दिर में,  इंसान -ए -अफी = पवित्र प्रकृति का मनुष्य , रोटियाँ = फिल्म 'काली टोपी लाल रुमाल ' में रफ़ी साहब ने एक नज़्म गायी थी " दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियाँ " जो मजरूह साहब ने लिखी थी , फ़लसफ़ी = दार्शनिक , हक़ -ए -मल्कियत = अधिशुल्क /रॉयल्टी - फिल्म 'नया दौर' के गीतों की रॉयल्टी के ऊपर लता जी से विवाद हो गया था , अज़ीम -औ -शफी = महान और ईमानदार, दरबारी राग = फिल्म 'बैजू बावरा' का गीत 'ओ  दुनिया के रखवाले' राग दरबारी पर आधारित था , अहल -ए -सदा -ए -सफी= स्पष्ट वाणी वाला )

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

ये दिल जब आ गया तुझ पर कहीं  अब जा नहीं सकता !
वो ऐसी कौनसी शै है  जो तुझसे पा नहीं सकता !!
कभी तुम बेवफा होंगे , कभी मैं बेवफा हूँगा,
कि ऐसी बात भी मैं तो ज़ेहन  में ला नहीं सकता !
यूँ तो गुनगुनाने की कोशिशें  सब ही करते हैं,
मोहब्बत ऐसा नग्मा है जो हर कोई गा नहीं सकता !
हज़ारों शमा जलती है हुस्न की यूँ तो दुनिया में,
मगर तेरे सिवा दिलबर कोई अब भा नहीं सकता !
"कमल" ये लोग कहते हैं , नहीं वो शख्स है कुछ भी,
ग़मों को सह नहीं सकता , चोट को खा नहीं सकता !


शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

ग़ज़ब का हुस्न मेरे दिलदार का है !
क्या बताऊँ, कितना लुत्फ़ दीदार का है !!
छिपी हुई है जिस में इकरार की बातें,
कुछ यूँ अंदाज़ उसके इनकार का है !
क़त्ल कर देती हैं उसकी तिरछी नज़रें,
तुम ही कहो! क्या काम तलवार का है !
जब से देखी वो उरियाँ बाहें, ढलता आँचल,
क़रीबे मर्ग अब हाल बीमार का है !
"कमल" मज़ा है तो सिर्फ उसकी उल्फत में,
बाकी जहाँ का मज़ा सब बेकार का है !

(हुस्न=सौंदर्य, लुत्फ़=आनन्द, दीदार=दर्शन, इकरार=स्वीकृति, अंदाज़=ढंग, इनकार=मनाही, उरियाँ बाहें=नंगे हाथ, क़रीबे मर्ग=मृत्यु के समीप, जहाँ=संसार )

शनिवार, 14 सितंबर 2013

जुल्फें शानों पे फिर हिलाती हुई!
मेरे पहलू में आ, खिलखिलाती हुई!!
संगेमरमर सी तेरी उजली कमर,
जैसे शमा कोई, झिलमिलाती हुई!
वस्ल की छाँव अब तो दे दे ज़रा,
धूप  फुरकत की है, चिलचिलाती हुई!
देखो मौसम हसीं, उमंगें जवाँ ,
गुज़रे खाली ना शब्, तिलमिलाती हुई!
लेके आगोश में खो जायें "कमल"
दुनिया रह जाये ये, बिलबिलाती हुई!
(शानों पे=कन्धों पर, वस्ल=मिलन, फुरकत=विरह, शब्=रात्रि, आगोश=गोद )

सोमवार, 12 अगस्त 2013


दुनिया के हसीं देखे, तुझसा शबाब नहीं है!
तू लाजवाब दिलबर, तेरा जवाब नहीं है!!
लाया कोई फ़रिश्ता जन्नत से तुझको याँ पर,
बाग़-ए -जहान में तो, ऐसा गुलाब नहीं है!
आँखों के आगे तेरी, मय की बिसात क्या,
इतना नशीला कोई, जाम-ए -शराब नहीं है!
पर्दों में छुपे जलवे कर देते हैं दीवाना,
मर जाये जान से गर कोई हिजाब नहीं है!
है शुक्र उस खुदा का, जो मिले "कमल" को तुम हो,
तेरा कुर्ब करना हासिल, किसका ख्वाब नहीं है?
(शबाब=यौवन, फ़रिश्ता=देव दूत, जन्नत=स्वर्ग, याँ=यहाँ, बाग़-ए -जहान=सँसार रुपी उपवन , मय=मदिरा, बिसात=सामर्थ्य, जाम-ए -शराब=मदिरा का प्याला, हिजाब=आवरण, कुर्ब=सामीप्य, हासिल=प्राप्त )

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

मेरे प्यारे दोस्तों ! आप सभी को "कमल शर्मा" की जानिब से  ईद बहुत बहुत मुबारक हो ! वो परवरदिगार आपके दिल की झोली को तमाम खुशियों से भर दे !

मुबारक हो , मुबारक हो, हम सबको ईद मुबारक हो !
जिस रब ने इतनी खुशियाँ दी उस रब को ईद मुबारक हो!!
इस जानिब भी, उस जानिब भी, खुशियों में डूबी सिम्त सभी,
पच्छिम को ईद मुबारक हो, पूरब को ईद मुबारक हो!
है ईद का मतलब दोस्त ख़ुशी, और खुशियों पर है सभी का हक,
हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई , सिख मजहब को ईद मुबारक हो!
चेहरे की ज़रा खुशियाँ देखो जिस जिस को भी ईदी मिली,
आँखों को ईद मुबारक हो , और लब को ईद मुबारक हो!
है चाँद तेरा एहसान "कमल" जो दीख गया कल शब् को तू,
इस दिन को ईद मुबारक हो, उस शब् को ईद मुबारक हो !
(जानिब=ओर , सिम्त=दिशा, मजहब=धर्म, लब =होंट, शब्=रात)