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शनिवार, 27 जुलाई 2013

मेरे प्रिय मित्रों !आप सभी मेरी रचनायें बड़े प्रेमपूर्वक पढ़ते  है  और अपने अमूल्य विचार भी व्यक्त करते हैं! इसके लिये मैं आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ और आपको कोटि कोटि धन्यवाद देता हूँ ! अब आप सब मेरी रचनायें/कविताये/ग़ज़लें हिंदी जगत की सुप्रसिद्ध प्रकाशन संस्था "हिंद-युग्म" से प्रकाशित "पगडंडियाँ" पुस्तक में भी पढ़ सकते हैं ! हाँ, पुस्तक पढ़कर अपने बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराईयेगा ! आपका अपना-------कमल शर्मा !
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जलवा नुमाई क्या हुई उसके शबाब की!
उम्मीदें और बढ़ गयी दिल-ए-बेताब की!!
उसकी आँखों का नशा अभी बाकी है,
हटाओ सामने से ये सुराही शराब की!
मैं अपनी ही दुनिया में खुश हूँ वाइज़,
हो तुझी को मुबारक दुनिया किताब की!
जो दिल में आया मेरे करूँगा वही मैं,
फुरसत नहीं जो सोचूँ गुनाहोसवाब की!
बस अब तो अपनी कलम रोकिये "कमल",
बेपर्दा हो ना जाये बातें हिजाब की!
(वाइज़=उपदेशक, किताब=धर्मशास्त्र, गुनाहोसवाब=पाप और पुण्य, हिजाब=पर्दा )
किस्मत ने देखो क्या खेल खेला !
तुम भी अकेले, मैं भी अकेला !!
जब से गए तुम, तब से ये दिल,
उजड़ा सा बाग़, बिखरा सा मेला !
जहाँ के सभी आशिकों को बुलाओ,
है कौन ऐसा? ना जिसने गम झेला !
शबोरोज़ वो ही फुरकत के गम,
नन्हीं सी जाँ और इतना झमेला !
"कमल" को ना आया करना मोहब्बत,
भले ही कहे लोग मजनूँ का चेला !
(शबोरोज़=रात-दिन, फुरकत=विरह)

शनिवार, 20 जुलाई 2013

और इजाफा हो गया है ख्वाहिश में!
सनम का साथ जो मिला बारिश में!!
मैं तो कह ही दूँगा आज हसरतें अपनी,
तुम भी कमी ना रखना फरमाईश में!
तकल्लुफ बरतरफ, कर लेंगे अब दिल की,
वक़्त क्यूँ खोना शुक्रिया नवाजिश में!
हम आगोश हुए, दिल को ही क्यूँ कहना,
आँखें भी शामिल थी इस हसीं साजिश में!
"कमल" के साथ जो भीगते देखा उसको,
रकीब भी आ गया लो गर्दिश में!
(इजाफा=वृद्धि, हसरतें=इच्छायें, तकल्लुफ बरतरफ=औपचारिकता छोडो, नवाजिश=धन्यवाद, हम आगोश=आलिंगन बद्ध, साजिश=षड़यंत्र, रकीब=प्रेमिका का दूसरा प्रेमी, गर्दिश=चक्कर )

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

बाँटो धरम के नाम पे ये किसकी सलाह है ?
जायेगी कहाँ किश्ती जब ऐसे मल्लाह है?
मालिक तो कुल जहान का एक ही तो है,
माला में राम है तो तस्बीह में अल्लाह है!
उस रब को याद रख हर अमल से पहले,
कहना श्री गणेश और पढना बिस्मिल्लाह है!
जो कुछ भी करो तुम हो काबिल-ए -तारीफ,
लगता है दिल को अच्छा कहता कोई वल्लाह है!
वालिद का साया भी अब सर से उठा अपने ,
लिखता है "कमल" खुद ही करता इस्लाह है!
(किश्ती=नाव, तस्बीह=माला, अमल=कर्म, वालिद=पिता, इस्लाह=संशोधन )

रविवार, 14 जुलाई 2013

हसरतें गुलों की ले, गुलज़ार में गया !
मगर पूरा दिन बीनते खार में गया !!
बिना खरीदे ही चला आया घर को,
फिर क्यूँ भला मैं बाज़ार में गया !
उतार दिया लोगों ने निगाहों से,
कल ज़रा जो मैं कूए यार में गया !
नींद, आराम, चैन, सुकूँ  सारा,
लुटा सब कुछ मैंने प्यार में दिया !
कर दिया वापस दिल को लेके "कमल ",
नक़द का माल भी उधार में  गया !