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शनिवार, 14 सितंबर 2013

जुल्फें शानों पे फिर हिलाती हुई!
मेरे पहलू में आ, खिलखिलाती हुई!!
संगेमरमर सी तेरी उजली कमर,
जैसे शमा कोई, झिलमिलाती हुई!
वस्ल की छाँव अब तो दे दे ज़रा,
धूप  फुरकत की है, चिलचिलाती हुई!
देखो मौसम हसीं, उमंगें जवाँ ,
गुज़रे खाली ना शब्, तिलमिलाती हुई!
लेके आगोश में खो जायें "कमल"
दुनिया रह जाये ये, बिलबिलाती हुई!
(शानों पे=कन्धों पर, वस्ल=मिलन, फुरकत=विरह, शब्=रात्रि, आगोश=गोद )