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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

'चार' नज़रें क्या हुई अब देखो 'चार' के ही कमाल होंगे !
प्यार से मेरे लबालब 'चार' दिन, 'चार' माह, 'चार' साल होंगे !
'चार' लफ्ज़ है यूँ तो इस मुहब्बत में कहने को,
मगर इन 'चार' से ही बाबस्ता सैंकड़ों जंजाल होंगे !
'चार' दीवारी में जिस्म की दिल क़ैद रह नहीं सकता,
निकल भगेगा जब कभी सामने जलवा-ए-जमाल होंगे !
'चार' दिन की ज़िन्दगी है इसे प्यार से जी लो यारों,
बगैर प्यार के तो ज़िन्दगी में फालतू के बबाल हों

गे !
'चार' लोगो के बीच में चर्चा है तेरे इश्क का "कमल",
रोज़-ए-हश्र ना जाने मुझसे भी कैसे कैसे सवाल होंगे !
(लबालब=भरपूर, चार लफ्ज़=चार शब्द! म ह ब त! शायर लोग कहते हैं कि "मुहब्बत" , मुसीबत से 'मु' , हलचल से 'ह', बरबादी से 'ब' और तबाही से 'त' लेकर बना है, बाबस्ता=सम्बंधित, जमाल=सौन्दर्य, रोज़-ए-हश्र=मृत्यु के उपरान्त का दिन जिस दिन निर्णय होता है कि अमुक व्यक्ति को स्वर्ग मिलेगा या नरक )

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