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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

लोग क्यूँ कहते हैं कि हुस्न कुछ नहीं काफिर के सिवा !
मेरे ख्याल से दुनिया भी कुछ नहीं गैब-औ-ज़ाहिर के सिवा !!
किसी की नज़रों में मुहब्बत खुदा से बढ़कर है,
किसी की नज़रों में इश्क कुछ नहीं ताजिर के सिवा !
ये इक फैसला हुआ काफी ज़िद्दोज़हद के बाद,
आदमी कुछ नहीं है तरतीब-ए-अनासिर के सिवा !
हमसे पहले भी था, अब भी है, आगे भी रहेगा ,
कौन है जाविदाँ खुदा-ए-हाज़िर-औ -नाजिर के सिवा !
ना दुखाओ दिल तुम कभी भी किसी

का भी,
मालिक यहाँ भी रहता है मस्जिद-औ-मंदिर के सिवा !
सामान जहाँ के खुश नहीं कर सकते "कमल",
कौन दे सकता मसर्रत तुमको खातिर के सिवा !
(काफिर=पापी, गैब-औ-ज़ाहिर=अप्रत्यक्ष -प्रत्यक्ष, ताजिर-व्यापार, तरतीब-ए-अनासिर=तत्वों का क्रम!कहते हैं मनुष्य का शरीर पांच तत्वों का बना है !पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश और वायु !..छिति जल पावक गगन समीरा *पञ्च रचित यह अधम शरीरा*!, जाविदाँ=स्थायी, हाज़िर-औ-नाजिर=सर्व व्यापक, मसर्रत=प्रसन्नता, खातिर=मन )

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