समर्थक

शनिवार, 17 नवंबर 2012

क्या ये दौर वक़्त-ए -नाज़ुक का नहीं?
उसके मुश्ताक हैं सब, इक्का दुक्का नहीं!!
प्यार से समझाओ दिल को बच्चे की तरह,
हर बात का इलाज लात या मुक्का नहीं!
उसने इक निगाह डाली, हमने दिल दे दिया,
बिलकुल , तीर था वो , कोई तुक्का नहीं!
अय मर्ग ज़रा ठहर दो कश  तो मार लूं,
शायद कि दस्तियाब जन्नत में हुक्का नहीं!
"कमल" सा आशिक ना देखा जहाँ में,
महफ़िल में इस बात का यूँ ही रुक्का नहीं !
(मुश्ताक=चाहने वाला, मर्ग =मौत, दस्तियाब=उपलब्ध, रुक्का=शोर)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें