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सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

किस्से...

किस्से नहीं है रास दुनिया-ए-अजीब के!
सुनने पड़े हैं ताने अक्सर हबीब के !!
था वादे का वो पक्का और पहुंचा वक़्त पर,
पर मेरे घर ना होकर, घर पर रकीब के!
रातें हैं कटती तन्हा दिन भी गुज़रता खाली,
शब्-औ-रोज़ हो गए गिरफ्त में नसीब के!
खुद ही दिया था उसने अपने निकाह का ख़त,
अरमान यूँ लुटे है देखो गरीब के!
अब बख्त है मुखालिफ तो "कमल" के रिश्तेदार,
सब हो गए हैं दूर जो थे करीब के !
(हबीब=मित्र, रकीब=शत्रु, शब्-ओ-रोज़=रात-दिन, बख्त=भाग्य, मुखालिफ=विपरीत)

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

...मेरा दिल ये आ गया

लो फिर किसी हसीन पर मेरा दिल ये आ गया !
अदाएं उसकी भा गयी, जलवा उसका भा गया!!
मिलाकर आँखों से आँखें बात करना वो ज़ालिम का,
कैफियत कम नहीं जिसकी नशा कुछ ऐसा छा गया,
झलकता साफ़ था उसका बदन का एक एक वो ख़त,
तंग वो पैरहन उसका क़यामत मुझ पे ढा गया !
मिला जब हुस्न ऐसा है करूँगा इश्क जी भर के,
ये माना इश्क ख़ूनी है अच्छों अच्छों को खा गया !
"कमल" तो मर ही चुका था गम-ए-दुनिया की चोट से,
रोज़ कुछ और जीने का बहाना फिर से पा गया !
(कैफियत=आनंद, ख़त=रेखा-चिह्न, पैरहन=पहनावा, क़यामत=प्रलय, रोज़=दिन)

शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

...समां चुके हो तुम

आँखों में पहले, फिर दिल में, अब रूह में समां चुके हो तुम !
ना उतरेगा ये प्यार का रंग, इस तरह से रमा चुके हो तुम !!
ये सोच के मैंने चूमा है, अपने हाथों को कई दफा,
ये हाथ वही जिन में अपने हाथों को थमा चुके हो तुम !
हरदम माँगूं बस यही दुआ, दम निकले तो तेरी बाँहों में,
अपने दम से मेरे दिल की दुनिया दमदमा चुके हो तुम !
क्या ख़ाक कमाया दुनिया में, इज्जत ना कमाई जो तुमने,
कहने को लाख करोड़ सही कितना ही कमा चुके हो तुम !
ये आज की तेरी ग़ज़ल "कमल" रखेगा ज़माना बरसों याद,
अपने शेरों से रंग ऐसा महफ़िल में जमा चुके हो तुम !

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

मेरा जनाज़ा...

मेरा जनाज़ा गुज़रता जो उसके मकान से निकला !
पूछते हैं, किसका है? जो इतनी शान से निकला !!
मुझको एहसास फिर भी गुलिस्ताँ का हुआ,
भले ही काफिला मेरा बियाबान से निकला!
कभी खाली ना गया ये मेरा दावा है,
जब कोई तीर उस शोख की कमान से निकला !
सिर्फ रह जायेंगे बस स्याही भरे ही पन्ने,
जो उसका ज़िक्र-ओ-नाम मेरे दीवान से निकला!
शेर कहते है ये उसको दुनिया वाले.
मस्ती में जो जुमला "कमल" की ज़बान से निकला !
(शोख=चंचल लड़की, दीवान=काव्य-संग्रह, जुमला=वाक्य)

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

याद है ?

खेतों के वो रास्ते और पगडंडी ! याद है ?
प्यार की गाडी को जब दी थी झंडी ! याद है?
सुबह से ही रहता था हमको इन्तिज़ार शाम का,
और फिर तेरा मिलने आना सब्जी मंडी ! याद है?
तेरा वो नज़रें झुकाना और वो मुस्काना फिर,
मेरा भी भरना धीरे से आहें ठंडी ! याद है?
याद कर जब रात में बैठे थे छुपके कोने में,
आके वो चौकीदार का खड्काना डंडी ! याद है?
दुनिया की नज़रों से दूर प्यार को रखना "कमल"
करती नफरत प्यार से दुनिया घमंडी ! याद है?

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

...मेरा मुस्तकबिल है तू !

तेरा माजी जो भी हो मेरा मुस्तकबिल है तू!
फैसला ये दिल का है, प्यार के काबिल है तू!!
कच्चे पक्के रास्तों पर अब तलक भटका किया,
हो गया बेफिक्र मैं मिल गयी मंजिल है तू!
सादगी चेहरे पे और आँखों में शर्म-ओ-हया,
झूठा है, जो कहता है कि कातिल है तू!
रह नहीं सकता हूँ जैसे जिंदा मैं बिन साँस के,
इस तरह से ज़िन्दगी में हो गयी शामिल है तू!
प्यार मुझको क्या हुआ कहने लगे है दोस्त सब,
अय "कमल" अब हो गया हमसे क्यूँ गाफिल है तू!
(माजी=अतीत, मुस्तकबिल=भविष्य)

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

मुक़द्दर...

मुक़द्दर राह-ए-जीस्त में कैसे मोड़ देता है !
पकड़ता एक है दामन, दूसरा छोड़ देता है !!
लोग मिलते ही रहते हैं कभी कैसे कभी कैसे,
कोई दिल जोड़ देता है, कोई दिल तोड़ देता है !
ज़माना भी यहाँ पर चाल चलता है दोरंगी,
कभी रखता छुपाके कभी भांडा फोड़ देता है !
ये भी सच है कि मंजिल मिलती उसको है,
इरादा करके जो पक्का लगा दौड़ देता है !
"कमल" जब भी करो प्यार सच्चा ही करना,
सच्चा प्यार ही बन्दे को रब से जोड़ देता है !
(राह-ए-जीस्त=जीवन-मार्ग )