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शनिवार, 29 सितंबर 2012

ख़त...

जब तक मेरे महबूब का ख़त नहीं आया!
दिल को सुकून मेरे किसी सूरत नहीं आय!!
क्यूँ नहीं दिया बोसा मुझे गैर के आगे,
ना, मुझको मज़ा-ए- अदावत नहीं आया!
तुमको भी क्या आज ही रखना था रोज़ा,
या फिर मुझको सलीका-ए-दावत नहीं आया!
बस मैं हूँ तुम हो और कोई तीसरा न हो,
क्यूँ ऐसा वक़्त-ए-खूबसूरत नहीं आया!
कब तलक चलेगा काम यूँ ही खतों से "कमल",
शब-ए-विसाल का क्या मुहूरत नहीं आया!
(सूरत=प्रकार, बोसा=चुम्बन,मज़ा-ए-अदावत=शत्रुता का आनंद, रोज़ा=व्रत,शब-ए-विसाल=मिलन की रात, मुहूरत=मुहूर्त)

तुम...

मैं ये नहीं कहता कि वादा फरामोश हो जाते हो तुम!
हाँ, दिखाके झलक, ज़रूर रूपोश हो जाते हो तुम!!
सिमट आई हो जैसे सारी दुनिया ही मेरी बाँहों में,
जब कभी शरमाते से हम आगोश हो जाते हो तुम!
एक तो मिलता ही कम है वक़्त बात करने को,
ऊपर से, बात करते करते खामोश हो जाते हो तुम!
संभाल लीजिये ये अपना ढलता हुआ आँचल,
ना कहना फिर मुझे कि मदहोश हो जाते हो तुम!
तुम्हें मालूम नहीं कि "कमल" कैसे जिंदा है,
कहीं गायब, लेके, ये मेरे होश हो जाते हो तुम!
(वादा फरामोश=प्रण तोड़ने वाला, रूपोश=अदृश्य)

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

ना माँग...

रातें जो तन्हा गुजारी हैं उनका हिसाब, ना माँग!
सोचते ही उमड़ता आँखों में सैलाब, ना माँग!!
रात क्यूँ सोये नहीं ये तो बताओ ज़रा,
दे ना पाऊँगा ऐसी बातों का जवाब, ना माँग!
वो किताब जिसमें शब-ए-गम के किस्से है मेरे,
मुझे बड़ी अजीज़ है वो किताब, ना माँग!
माँगने से तो ना मिलती ये मोहब्बत ज़माने में,
हो जाती है, जिसको होनी हो दस्तियाब, ना माँग!
वफ़ा, वो भी ज़माने से, क्या "कमल" तुम भी.
ये सब पुरानी बातें हैं दिल-ए-बेताब, ना माँग!
(सैलाब=बाढ़, अजीज़=प्रिय, दस्तियाब=उपलब्ध )

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

उसका शबाब

लो आज बतलाता हूँ मैं कैसा उसका शबाब है !
खुद तो गुलाब है ही वो, उसकी हर शय गुलाब है !!
गुलाब की सी रंगत है उसके गुलाबी गालों की,
खिलती जवानी गुलाब सी, करती ईमां खराब है !
गुलाब-जल से कम नहीं उसके पसीने की बूँदें,
झलक जाती है माथे पर, कभी जब उठता नकाब है !
गुलाब की डाली सी झुकती  वो शानो पे गरदन ,
शरमाता उसके रुख से, फलक का माहताब है !
गुलाब की पंखुड़ी है उसके दो प्यारे से होंट,
"कमल" वो आँखें है उसकी या जाम-ए-शराब है !
(शय=वस्तु, शानो=कन्धों, रुख=मुख मंडल, फलक=गगन, माहताब=चंद्रमा )

बुधवार, 19 सितंबर 2012

***ग़ज़ल***

अब तो उसके भी दिल में तमन्ना जाग उठी !
जितनी इधर थी, उधर भी उतनी ही आग उठी !!
जब से आँखों में बसी है उसकी चाँद सी सूरत,
नींद भी क्या करती बेचारी भाग उठी !
क्या बताऊँ ? कैसी कैसी उठती है तमन्नाएं दिल में,
यूँ समझिये हर वक़्त जैसे मस्ती-ए-फाग उठी !
होने को हो चुकी है उम्र पार चालीस के,
मगर इस दिल में ना हसरत-ए-बैराग उठी !
अजब ही चीज़ है प्यार का एहसास "कमल",
लगता है ज़िन्दगी भी गुनगुनाती राग उठी !
(मस्ती-ए-फाग=फाल्गुन का आनंद, हसरत-ए-बैराग=वैराग्य की इच्छा )

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

***ग़ज़ल***

दिल-ए-गरीब को अब दीदार की भीख, दे दे ज़रा !
और मुमकिन हो तो मिलने की कोई तारीख, दे दे ज़रा !!
अपना अफसाना भी शाही अफसानों से कम तो नहीं,
किस्सा-ए-पाक उनको, जो लिखते तवारीख, दे दे ज़रा !
प्यार यूँ करते हैं और यूँ निभाते हैं इसको,
आने वाली नस्ल को, चल, ये भी सीख, दे दे ज़रा !
अब के आओ तो रकीबों के घर के आगे से आना,
बड़े सुकून में है वो, उनको थोड़ी चीख, दे दे ज़रा !
"कमल" की एक ही ख्वाहिश मेरे हाथ में तेरा हाथ रहे,
हाथ ये, जिस में किस्मत रही है दीख, दे दे ज़रा !
(किस्सा-ए-पाक=पवित्र कथा, तवारीख=इतिहास, नस्ल=पीढी, रकीब=दुश्मन, प्रेमिका का दूसरा प्रेमी )

सोमवार, 17 सितंबर 2012

***ग़ज़ल***

छोटी छोटी बातों से होते ना यूँ उदास है !
दूर हूँ तो क्या हुआ मेरा दिल तो तेरे पास है !
जो भी बातें आयें दिल में, रखना उन्हें संभाल के,
जिस दिन मिलेंगे, कर लेंगे, जितनी भी बातें ख़ास है !
हम सबक ले सकते हैं, चंदा से और चकोर से,
दूर वो भी बहुत है लेकिन फिर भी आस है !
तेरी भी मजबूरियां है और मेरी भी सनम,
वरना फिर तुम ही कहो किसको जुदाई रास है !
दूर रहने से "कमल" दो बातें होना पक्का है,
याद भी आती है ज्यादा, दिल की भी बढती प्यास है !