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रविवार, 9 सितंबर 2012

मेरा महबूब...

मेरा महबूब सज धज कर कभी जब साथ चलता है !
मुक़द्दर कोसता है ग़ैर और हाथों को मलता है !!
ना कोई है गरज मय से ना कोई काम मयखाने,
नशा है जो जहाँ भर का, तेरी आँखों में ढलता है !
हुनर है ये तो दिलबर का, सँभाल लेता है जो मुझको,
नहीं काबू कोई रहता कभी जब दिल मचलता है !
कोई आसाँ नहीं है काम उल्फत का निभाना भी,
लहू से सींचना पड़ता तो शज्र -ए-इश्क फलता है !
किसी को क्या मिला ये तो अपनी अपनी किस्मत है,
"कमल" फिर तेरी किस्मत से ज़माना क्यूँ ये जलता है !
(शज्र -ए-इश्क=प्रेम का वृक्ष )

***ग़ज़ल***

जी में आया है तेरे हुस्न पर इक ग़ज़ल लिखूँ !
कल का इन्तिज़ार कौन करे बस इसी पल लिखूँ !!
गुलाब की पंखुड़ी है दो, तेरे ये होंट नरम,
गलत ना होगा जो चेहरे को कँवल लिखूँ !
ये तेरी उठती जवानी, ये तेरा जोशीला बदन,
मेरी तो ज़िन्दगी है ये, मैं क्यूँ अजल लिखूँ !
आओ बाँहों में मेरी, तबियत का आज तकाज़ा है,
लफ़्ज़ों में हाये कैसे दिल की उथल पुथल लिखूँ !
लो लिखते लिखते शेर, ग़ज़ल भी हो गयी पूरी,
सब कुछ तो लिख दिया, अब क्या "कमल" लिखूँ !
(कँवल=कमल का फूल, अजल=मृत्यु, तकाज़ा=माँग)