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शनिवार, 10 नवंबर 2012

...इम्तिहाँ मेरा

रोज़ उल्फत में होता इम्तिहाँ मेरा!
समझता कोई नहीं दर्द-ए-निहाँ मेरा !!
महशर में किस से क्या रखूँ उम्मीद,
जब वो अपना ना हुआ यहाँ मेरा!
नहीं है मेरी ज़रुरत किसी को भी,
छुटता जाता है अब कारवाँ मेरा!
दिल का गुल उसने खिलने ना दिया,
तोड़ के खुश है बागबाँ मेरा !
"कमल" जियेजा ज़िन्दगी को यूँ ही,
अब ना ज़मीं तेरी, ना आसमाँ तेरा!

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

...चश्मा

सिर्फ मुझ पर नहीं कितनो पे कहर ढाएगा,
धूप में तेरा निकलना, लगा काला चश्मा!
खड़ा हूँ देर से मैं तेरी गली के नुक्कड़ पर,
तू भी आजा ज़रा, घरवालो को दे चकमा!
साथ में चल तू मेरे शाने पे हाथ रख कर,
बैठने दे, जिसके बैठता है दिल पे सदमा!
दुनिया वालो तुम जिसको समझते हो चाँद,
दरअसल वो है मेरे यार के कमीज़ का तकमा!
"कमल" ने पढ़ लिए चार लफ्ज़ मोहब्बत के,
बरहमन मंत्र पढ़े, शैख़ जी पढ़े कलमा !
(कहर=मुसीबत, चकमा देना=बहकाना, शाने=कंधे, तकमा=बटन,लफ्ज़=अक्षर, बरहमन=पुजारी ब्राह्मण, कलमा=मुस्लिम श्लोक )

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

...चैन मेरा छीन के

जब से बेदर्दी गया वो चैन मेरा छीन के!
ख्वाबों की रातें गयी दिन गये तस्कीन के!!
उलझनों में इश्क की किस क़दर उलझे रहे,
ना ही दुनिया के रहे, ना रहे हम दीन के!
आजू बाजू घूमते थे जो मेरे बन कर के दोस्त,
भेद लेकिन खुल गया साँप थे आस्तीन के!
इस जहाँ ने तो उड़ाया मेरी उल्फत का मज़ाक,
काश दुनिया देख पाती बल मेरे जबीन के!
वक़्त पूरी ज़िन्दगी में वो ही अच्छा था "कमल",
जो गुज़ारा था कभी पहलू में उस हसीन के!
(तस्कीन=आराम, कदर=तरह, दीन=धर्म, बल=सिलवट, जबीन=माथा)

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

कैसे हो?

कैसे हो? पूछा उसने, मुझसे मिलाके हाथ!
मैंने कहा, "दुआ है", थोडा दबा के हाथ!!
जन्नत में घूम रहा हूँ, एहसास ये हुआ,
काँधे पे रख दिया जब, उसने घुमा के हाथ!
फैली हुई सब मस्ती, सिमट आयी एक जा,
सीने से जो लगाया, दोनों फैला के हाथ!
दुनिया ही हिल गयी मेरी, जब उसने ये कहा,
चलते  है अब, अलविदा, हवा में हिला के हाथ!
फिर जान भी छोड़ देगी, "कमल" के जिस्म को,
ना जाना जानेमन, मुझसे छुड़ा के हाथ!
(जा=जगह)

सोमवार, 5 नवंबर 2012

हर वक़्त...

हर वक़्त यूँ ना नसीब को कोसा कीजिये!
कोई ना बड़ा रब से है, भरोसा कीजिये!!
बच्चों की तरह मुश्किल है रिश्ते सँभालना,
रिश्तों को भी ज़रा पाला-पोसा कीजिये!
गर तेरे दर पे आये कोई भूखा प्यासा शख्स,
रूखा या सूखा जैसा हो परोसा कीजिये!
ना ना की बात ठीक नहीं वस्ल की शब् में,
जिद छोड़, कुबूल इल्तिजा-ए-बोसा कीजिये!
बदले हैं सिर्फ शौक़ पर मैं तो हूँ वही,
सुलूक "कमल" के साथ अपनों सा कीजिये!

शनिवार, 3 नवंबर 2012

मैं क्या...

मैं क्या, किसी को भी कर देंगे पागल,
ये मेहंदी के हाथ, महावर के पाँव !
ग़मों से झुलसते को राहत मिलेगी,
जो मिल जाये तेरी जुल्फों की छाँव!
तेरे ख्वाब, तेरे ख्याल, तेरी ही यादें,
लो बसने लगा है मेरे दिल का गाँव!
तेरी बोली प्यारी कोयल की कुहू सी,
ज़माना है कौआ करे काँव-काँव !
ये मेरी है किस्मत कि जीतूँ या हारूँ,
"कमल" ने लगा डाला उल्फत का दाँव!

कोई नहीं इस जहान में

मेरे यार जैसा कोई नहीं इस जहान में !
कम है, कितना भी लिखूँ उसकी शान में!!
हो जाये वो खफा तो निकल जाती मेरी जान,
जो हो जाये मेहरबाँ, जान आ जाये जान में!
गर बात करूँ उस से तो करता ही रहूँ मैं,
एक शहद सा टपकता उसकी ज़बान में!
दुनिया में हसीं देखे हैं यूँ तो बेशुमार,
पर बात ही अलग उसकी आन-बान में!
गर वो नहीं , "कमल" का भी वजूद कुछ नहीं,
कोई रस नहीं शेर,ग़ज़ल और दीवान में!
(वजूद=अस्तित्व, दीवान=काव्य-संग्रह)