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रविवार, 21 अक्टूबर 2012

मेरा दावा...

यही है मेरा दावा भी यही मेरा यकीन है !
कि मेरे यार के जैसा नहीं कोई हसीन है !!
फैसला हो गया होगा अब तो फरिश्तों में,
कि बढ़के हूर-ए-जन्नत से कहीं हूर-ए-ज़मीन है !
रुख-ए-रोशन के क्या कहने चाँद भी रश्क करता है,
फलक के चाँद से उजला मेरा माहेजबीन है !
ग़जल कैसे ये लिखता मैं, ना होते वो ज़माने में,
उन्हीं के दम से ही यारों मेरी दुनिया रंगीन है !
नहीं देखा नहीं देखा, हुस्न है या क़यामत है,
"कमल" तू ही नहीं, सब ही, कहते आफरीन है !
(रुख-ए-रोशन=ओजस्वी मुखमंडल, रश्क=ईर्ष्या, फलक=आकाश, माहेजबीन=चाँद जैसे मस्तक वाला, क़यामत=प्रलय, आफरीन=शाबाश, वाह )

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

लिखने की आदत...

लिखने की आदत मेरी गंदी सही !
आज ग़ज़ल नहीं, तुकबंदी सही !!
आ दोनों मिलके दुआ माँगते हैं,
मैं बंदा खुदा का, तू बंदी सही !
ना करो तर्क-ए-ताल्लुकात हमसे,
दोस्ती ना सही, भाई बंदी सही !
जलवे देखो मगर अदब के साथ,
हुस्न की इश्क पे पाबंदी सही !
जान भी दे दे "कमल" उनको,
भले ही जाती है मंदी सही !!
(तर्क-ए-ताल्लुकात=सम्बन्ध - विच्छेद )

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

...सिर्फ सात नहीं

रहूँगा हर जनम मैं साथ , सिर्फ सात नहीं !
अलग होती हुस्न से इश्क की जात नहीं !
नहीं डूबेगा, नहीं डूबेगा, सफीना-ए- इश्क मेरा,
सातों समंदर मिल के डुबो दे इतनी औकात नहीं !
ख्याल-ए-जुदाई भी तुम अपने दिल में ना लाना,
सातों दिन अपने हैं, एक दिन या एक रात नहीं !
एक प्यार के ही रंग में सारे रंग है शामिल ,
सातों रंग धनुक के करते क्या इशारात नहीं !
देखना प्यार "कमल" अपना  बुलंदी पे जायेगा,
सातों आसमानों से आगे, वरना कोई बात नहीं !
(जात=जाति, सफीना-ए-इश्क=प्रेम की नाव, इशारात=संकेत, धनुक=इन्द्र धनुष )

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

ग़ज़ल

क्या रदीफ़,काफिया, मतला, बहर, मकता है!
जिसको इल्म है वो ही ग़ज़ल लिख सकता है !
थक के जो बैठ गया उसे मंजिल कहाँ नसीब,
सही मुसाफिर ना मंजिल से पहले थकता है!
छकते होंगे तेरे मयकश तेरी महफ़िल में,
ये निगाहों से पीने वाला कहाँ छकता है !
सीख लो कोई हुनर मेरी मानो तो प्यारों,
एक अच्छा हुनर कई ऐबों को ढकता है!
हर एक शेर लिखा खिरद से सलाह लेकर,
भले ही लोग कहे "कमल"  तो बकता है !
(खिरद=बुद्धि )

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

...जुड़ गया

आशिकों में उसके मेरा भी नाम जुड़ गया !
उसके दिलेखास से मेरा दिलेआम जुड़ गया !!
कुछ जल्दी पहुँच जाता हूँ अब उसकी गली मैं,
रफ़्तार बढ़ गयी मेरी या रस्ता सिकुड़ गया!
उसकी नज़र का जादू नहीं है तो क्या है ये,
दिल उसका हो गया और मुझसे बिछुड़ गया!
उम्मीदवार कितने ही थे उसके जलवों के,
ज़हेनसीब उसका रुख मेरी जानिब मुड गया !
है रंग गया "कमल" तो उसके ही रंग में अब,
गैरों के चेहरे देखो, रंग ही है उड़ गया !!
(दिलेखास=महत्वपूर्ण ह्रदय, दिलेआम=साधारण ह्रदय, रफ़्तार=चाल, ज़हेनसीब=अहोभाग्य, रुख=झुकाव, जानिब=तरफ)

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

...रोता हूँ

याद आता है यार...रोता हूँ !
किया था क्यूँ ये प्यार...रोता हूँ !!
दिल को एक बार मैं लगा बैठा,
दिल को अब बार बार...रोता हूँ!
बड़ा संभाल के रखा था दामन,
हो गया तार तार...रोता हूँ!
अब तो तेरा ही बस सहारा है,
मेरे परवरदिगार...रोता हूँ!
आँसू आते हैं तो रुकते ही नहीं,
"कमल' मैं जार जार ...रोता हूँ !

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

वो दिन...

वो दिन ख़ाक दिन जो यार से बात ना हो!
खाली सा वक़्त गुज़रे और मुलाक़ात ना हो!!
गुज़रता है एक एक पहर क़यामत की तरह,
ना, किसी के नसीब में ऐसी रात ना हो!
दिल की चाहत ना ज़माने में कभी जाहिर हो,
रहे ख्याल ये, रुसवा तेरे जज़्बात ना हो!
यार हो साथ में और सोये मुँह फेर कर,
इस क़दर पैदा ज़िन्दगी में हालात ना हो!
"कमल" तो खुश है यार मिलनसार मिला,
ज़िन्दगी बेकार लगे जो उसका साथ ना हो!