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सोमवार, 10 सितंबर 2012

आज वो बदला है कैसा जो मेरा हमराह था!
अब तो कुछ लगता है ऐसा, प्यार भी गुनाह था !!
आज ये आलम, मैं उनकी ख़ार हूँ निगाह का,
एक वो भी दौर था जब अंजुम-ए-निगाह था !
पायेगा सौ सौ सजाएं चाह के एक जुर्म पर,
ऐसे दस्तूरों से या रब दिल नहीं आगाह था !
न करेंगे शिकवा तुझसे ज़िन्दगी में हम कभी,
समझेंगे किस्मत के हाथों होना घर तबाह था !
ज़िन्दगी की किश्ती हमने सोंपी थी जिसको "कमल",
आज वो शक्ल-ए-भँवर है, कल तलक मल्लाह था !
मेरा दिल तेरी जुल्फों के पेंचों में अटक गया !
कि जैसे शहर की शब में कोई राही भटक गया !
तुझे पा भी नहीं सकता तुझे खो भी नहीं सकता,
मुक़द्दर मेरा ये मुझको कहाँ लाके पटक गया !
कहाँ पहरों किये बातें, कहाँ अब साथ लम्हों का.
ये मेरा प्यार भी शायद ज़माने को खटक गया !
देख कर हाल को मेरे अब सब दोस्त कहते हैं,
हुआ ये क्या तुझे तू तो बिलकुल झटक गया !
मोहब्बत में "कमल" इस दिल की हालत यूँ भी होती है,
गिरा जो आसमान से तो खजूर पर जा लटक गया !
कहाँ ये और सुकूँ जो तेरी बाँहों में है !
मय का पुरकैफ नशा तेरी निगाहों में है !!
लबों की नाज़ुकी मलमल से मेल खाती है,
कुछ भी हो हुस्न-ए-जहाँ तेरी पनाहों में है !
मार डालेगी मुझे तेरी कातिल ये अदा,
रख दिया खोल के दिल तेरी राहों में है !
शर्मा के अब तो हम आगोश हो जाओ,
आज देखेगा "कमल" कितना असर आहों में है !
(इस छोटी सी ग़ज़ल में मेरा पूरा नाम-कमल कुमार शर्मा छिपा है)

रविवार, 9 सितंबर 2012

***ग़ज़ल***

देखता हूँ रंग क्या लाती है अब मेरी वफ़ा !
प्यार भी सच्चा है मेरा और दिल भी है सफ़ा !!
हाँ, किया है प्यार मैंने और रहूँगा करता भी,
हौसले तो कम नहीं है, अय ज़माने की जफ़ा !
राह-ए-उल्फत में क़दम उठ तो पड़े हैं दोस्तों,
डर सा लगता है कहीं किस्मत ना हो जाये खफ़ा !
दिल का सौदा कर लिया है इश्क के बाज़ार में,
मैं नहीं अब सोचता क्या है नुकसान-औ-नफ़ा!
ना मिले जो हम कभी तो होगा फिर क्या "कमल",
ज़ेहन में ऐसी भी बातें आती है कई कई दफ़ा !
(सफ़ा= साफ़, नुकसान-औ-नफ़ा=हानि-लाभ)

***ग़ज़ल***

शराफत सादगी उसकी, मेरा दिल ले चली मुझसे !
थी बस बात इतनी सी और दुनिया जली मुझसे !!
कभी मस्ती के रंग में जब भी मैं गुलशन को जाता हूँ,
'मुबारक हो' 'मुबारक हो'. कहे है हर कली मुझसे !
मैं सदके जाऊँ उसके और उसकी मिलनसारी के,
मैं जब चाहूँ, तभी मिलती. खूब अच्छी भली मुझसे !
ज़माने के ग़मों से जब हो जाता परेशाँ हूँ,
कहती है, 'चले आओ'. यही उसकी गली मुझसे !
"कमल" साहेब आप भी इश्क के चक्कर में पड़ गए.
हाथ से खो दोगे जन्नत, कहते सब वली मुझसे !
(वली=धर्माचार्य)

***ग़ज़ल***

दिल आता किसी का, जब किसी हसीन पे है !
और चढ़ जाता रंग-ए-मस्ती दिल-ए-शौक़ीन पे है !
ऐतबार कितना हो जाता है एक दूजे पर.
हो भी क्यूँ ना, दुनिया टिकी यकीन पे है !
कहते हैं सब कुछ जायज़ होता है प्यार में,
फिर क्या सोच कर ये शिकन जबीन पे है !
आँखों का भी कसूर होता है बहकने में दिल के,
इल्ज़ाम क्यूँ ये सारा मौसम रंगीन पे है !
दुनिया ढूँढा करें चाँद को आसमां पे कहीं,
"कमल" का चाँद तो यहीं इसी ज़मीन पे है !
(शिकन=सिलवट, जबीन=माथा )

थोड़ी सी शरारत करने दो...

मौसम है हसीं और दिल है जवाँ,
थोड़ी सी शरारत करने दो.........!
ठंडी आहें कब तक मैं भरूँ,
साँसों में हरारत करने दो..........!
तुम रूठो ज़रा मैं मनाऊँ तुम्हें,
हासिल ये महारत करने दो.......!
किस किस को जहाँ में खुश रखूँ,
जो करता हकारत करने दो.......!
हम प्यार करे जी भर के "कमल"
दुनिया को तिजारत करने दो ....!
(हरारत=गर्मी, महारत=विशिष्टता, हकारत=घृणा, तिजारत=व्यापार)